जंतर-मंतर हिंसा मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त, पूर्व जज की कमेटी करेगी जांच; वीडियो और शिकायतें सौंपीं
नई दिल्ली। दिल्ली के जंतर-मंतर पर जुलाई में हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान हिंसा और पुलिस कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने 5 नवंबर को अहम निर्देश दिए। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने मामले से जुड़ी याचिकाएं, वीडियो फुटेज और शिकायतें पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश आर. सुभाष रेड्डी की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय हाई पावर इंक्वायरी कमेटी (HPEC) को सौंपने का निर्देश दिया। अदालत ने कमेटी से नियमित अंतराल पर अंतरिम रिपोर्ट पेश करने को भी कहा।
सुनवाई के दौरान कमेटी की ओर से बताया गया कि प्रदर्शन के दौरान प्रभावित लोगों और पुलिसकर्मियों से शिकायतें मांगी गई थीं। इसके लिए देशभर के 149 अखबारों में सार्वजनिक सूचना प्रकाशित की गई और ऑनलाइन पोर्टल भी शुरू किया गया, लेकिन अब तक बहुत कम शिकायतें प्राप्त हुई हैं। पर्याप्त सामग्री नहीं मिलने के कारण कमेटी फिलहाल हिंसा की घटनाओं पर कोई निष्कर्ष नहीं निकाल सकी है।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश किए गए वीडियो, शिकायतें और संबंधित दस्तावेज कमेटी तक पहुंचाए जाएं। अदालत ने कहा कि पीड़ितों की ओर से उनके वकील भी याचिकाओं और सहायक सामग्री की डिजिटल प्रतियां कमेटी को दे सकते हैं। कमेटी उपलब्ध सामग्री के आधार पर संबंधित पक्षों से जवाब लेकर जांच आगे बढ़ाएगी।
पांच सदस्यीय कमेटी की अध्यक्षता पूर्व न्यायाधीश आर. सुभाष रेड्डी कर रहे हैं। इसमें पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रवि शंकर झा, दिल्ली हाईकोर्ट की पूर्व न्यायाधीश शालिंदर कौर, पूर्व सीबीआई निदेशक ऋषि कुमार शुक्ला और मेघालय के पूर्व डीजीपी एलआर बिश्नोई शामिल हैं।
कमेटी को प्रदर्शनकारियों पर कथित पुलिस ज्यादती, सुरक्षा बलों पर हमले, महिला प्रदर्शनकारियों के साथ कथित दुर्व्यवहार, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान और दोनों पक्षों के घायलों से जुड़े मामलों की जांच करनी है। सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से महिला प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित लक्षित हिंसा और पुलिस की कार्रवाई से जुड़े पहलुओं को प्राथमिकता देने को कहा है।
अदालत ने कमेटी को अपनी पहली तथ्यात्मक रिपोर्ट एक महीने के भीतर सौंपने का निर्देश भी दिया है। मामले की अगली सुनवाई 2 दिसंबर को होगी। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कमेटी के गठन से पुलिस या अन्य सुरक्षा एजेंसियों को नियमों का उल्लंघन करने वाले अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई करने से नहीं रोका गया है।
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