2002 का कोचिंग कानून लागू नहीं करा सकी उत्तर प्रदेश सरकार, 2026 में नया अध्यादेश लाने चली! जवाबदेही किसकी?

वर्ष 2002 में उत्तर प्रदेश ने कोचिंग संस्थानों को विनियमित करने के लिए कानून बनाया था। 2024 में केंद्र सरकार ने कोचिंग केंद्रों के लिए दिशानिर्देश जारी किए और 2026 में लखनऊ की भयावह अग्निकांड त्रासदी के बाद प्रदेश सरकार नए अध्यादेश की तैयारी कर रही है। लेकिन इन 24 वर्षों में कानून लागू करने की जिम्मेदारी किसकी थी? क्या सरकारें केवल कानून बनाने के लिए हैं, उन्हें लागू करने के लिए नहीं? क्या नौकरशाही की जवाबदेही केवल फाइलों पर हस्ताक्षर करने तक सीमित है? और क्या विद्यार्थियों की जान की कीमत इतनी कम है कि हर बड़ी दुर्घटना के बाद ही शासन व्यवस्था को अपनी जिम्मेदारियां याद आती हैं?

Sunday, November 1, 2026 - 20:08
Updated: 1 hour ago
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2002 का कोचिंग कानून लागू नहीं करा सकी उत्तर प्रदेश सरकार, 2026 में नया अध्यादेश लाने चली! जवाबदेही किसकी?

सरकारों की कार्यशैली का एक विचित्र और दुखद पहलू है। जब तक कोई बड़ी दुर्घटना नहीं होती, तब तक नियम-कानून, निरीक्षण, सुरक्षा मानक और प्रशासनिक जवाबदेही अक्सर सरकारी फाइलों में ही सिमटे रहते हैं। लेकिन जैसे ही किसी हादसे में निर्दोष लोगों की जान जाती है, अचानक पूरा सरकारी तंत्र सक्रिय हो जाता है। बैठकें होती हैं, जांच समितियां गठित होती हैं, अधिकारियों को निर्देश जारी होते हैं, निरीक्षण अभियान शुरू होते हैं और नए कानून बनाने की घोषणाएं होने लगती हैं।

लखनऊ की अग्निकांड त्रासदी के बाद उत्तर प्रदेश में कोचिंग संस्थानों को नियंत्रित करने के लिए नए अध्यादेश की तैयारी इसी प्रशासनिक प्रवृत्ति को फिर सामने लाती है। 50 से अधिक विद्यार्थियों वाले कोचिंग केंद्रों के पंजीकरण, अग्नि सुरक्षा, शिक्षकों की न्यूनतम योग्यता, फीस और अध्ययन सामग्री की लागत पर नियंत्रण जैसे प्रस्ताव सामने आए हैं। लेकिन प्रदेश में वर्ष 2002 से ही उत्तर प्रदेश कोचिंग विनियमन अधिनियम प्रभावी रहा है। ऐसे में नया अध्यादेश लाने से पहले सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि पुराने कानून के क्रियान्वयन में 24 वर्षों तक क्या हुआ, कितने संस्थानों का निरीक्षण हुआ, कितनों पर कार्रवाई हुई और किन विभागों ने अपनी जिम्मेदारियां निभाईं या नहीं निभाईं। यह मामला केवल निजी कोचिंग संस्थानों की मनमानी का नहीं, बल्कि कानून के शासन, प्रशासनिक जवाबदेही, शहरी नियोजन, भवन सुरक्षा, व्यावसायिक शिक्षा के अनियंत्रित विस्तार और सरकारी तंत्र की विश्वसनीयता का है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार इस बार भी केवल दुर्घटना के बाद कार्रवाई का प्रदर्शन करेगी या ऐसी स्थायी व्यवस्था बनाएगी जिसमें अगली दुर्घटना होने से पहले ही खतरे समाप्त किए जा सकें?

एक त्रासदी, एक सरकारी घोषणा और 24 वर्षों का अनुत्तरित सवाल

लखनऊ की अग्निकांड त्रासदी ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश के कोचिंग उद्योग और उससे जुड़ी सुरक्षा व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है। जिन स्थानों पर विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करने, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने और अपने भविष्य को संवारने के लिए जाते हैं, यदि वही स्थान आग लगने जैसी आपातकालीन परिस्थितियों में उनके लिए जानलेवा साबित हों, तो यह केवल एक भवन में हुई दुर्घटना नहीं रह जाती। यह समाज, प्रशासन, नियामक संस्थाओं और सरकार की सामूहिक जिम्मेदारी का प्रश्न बन जाता है।

घटना के बाद सरकार ने कोचिंग संस्थानों की जांच, सुरक्षा ऑडिट, पंजीकरण और नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई की दिशा में कदम उठाने शुरू किए। अब उत्तर प्रदेश कोचिंग (विनियमन) अध्यादेश-2026 लाने की तैयारी की खबरें सामने आई हैं। प्रस्तावित व्यवस्था में 50 से अधिक विद्यार्थियों वाले कोचिंग केंद्रों का पंजीकरण अनिवार्य करने, अग्नि सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम सुनिश्चित करने, शिक्षकों की न्यूनतम योग्यता स्नातक निर्धारित करने और फीस तथा अध्ययन सामग्री की लागत को विनियमित करने की बात कही जा रही है। नियमों के उल्लंघन पर 50 हजार से लेकर 1.50 लाख रुपये तक जुर्माने का प्रस्ताव भी बताया गया है।

निश्चित रूप से कोचिंग उद्योग में नियमन की आवश्यकता है। विद्यार्थियों की सुरक्षा, शिक्षा की गुणवत्ता, आर्थिक पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही सुनिश्चित करना सरकार का दायित्व है। लेकिन किसी नए कानून का स्वागत करने से पहले एक बुनियादी प्रश्न का उत्तर आवश्यक है।

जब उत्तर प्रदेश में 27 जून 2002 से कोचिंग विनियमन अधिनियम लागू था, तब इन 24 वर्षों में सरकार और प्रशासन क्या कर रहे थे?

क्या उस कानून के तहत पंजीकरण की व्यवस्था समाप्त हो गई थी? क्या संबंधित अधिकारियों के पास निरीक्षण करने का अधिकार नहीं था? क्या अनियमितताओं पर कार्रवाई का कोई प्रावधान नहीं था? क्या पंजीकरण निरस्त करने और जुर्माना लगाने की व्यवस्था अनुपस्थित थी?

नहीं। कानून में इन विषयों के लिए प्रावधान मौजूद थे।

फिर भी यदि आज सरकार को नए सिरे से पंजीकरण, निरीक्षण, निगरानी और दंड की व्यवस्था की आवश्यकता महसूस हो रही है, तो इसका अर्थ है कि पुराने कानून के क्रियान्वयन और उसकी प्रभावशीलता की गंभीर समीक्षा जरूरी है।

यहां प्रश्न नया कानून बनाने का विरोध करने का नहीं है। प्रश्न यह है कि नया कानून बनाने की आवश्यकता पैदा क्यों हुई और पुराने कानून की विफलता के लिए जवाबदेह कौन है?

उत्तर प्रदेश कोचिंग विनियमन अधिनियम, 2002: कानून था, अधिकार थे, फिर व्यवस्था कहां थी?

उत्तर प्रदेश विधानमंडल ने वर्ष 2002 में कोचिंग संस्थानों के नियमन के लिए एक विशिष्ट कानून बनाया था। इसका पूरा नाम उत्तर प्रदेश कोचिंग विनियमन अधिनियम, 2002 है। यह उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 5, 2002 के रूप में अस्तित्व में आया और 27 जून 2002 से प्रभावी हुआ।

अधिनियम का उद्देश्य स्पष्ट था। कोचिंग प्रदान करने वाले व्यक्तियों, कोचिंग केंद्र स्थापित करने वालों, उनका संचालन करने वालों, प्रबंधन करने वालों और अनुरक्षण करने वालों के पंजीकरण तथा उनसे संबंधित विषयों को विनियमित करना।

इस कानून की धारा 2 में कोचिंग की परिभाषा दी गई है, जिसमें तीन या उससे अधिक व्यक्तियों को किसी विषय या विद्या की शाखा में अध्यापन, शिक्षण अथवा मार्गदर्शन प्रदान करना शामिल है। कोचिंग केंद्र की परिभाषा भी दी गई है।

धारा 3 में पंजीकरण की व्यवस्था है। धारा 5 में निर्धारित परिस्थितियों में पंजीकरण के निलंबन अथवा निरस्तीकरण का प्रावधान है। धारा 7 में निर्दिष्ट गतिविधियों और बिना वैध पंजीकरण संचालन पर प्रतिबंध से संबंधित व्यवस्था है। धारा 8 निरीक्षण, अभिलेखों की जांच, कमियों की पहचान और उनके सुधार से जुड़ी है। धारा 9 में निर्दिष्ट उल्लंघनों के लिए आर्थिक दंड की व्यवस्था की गई है।

अर्थात 2002 में ही राज्य सरकार ने यह स्वीकार कर लिया था कि कोचिंग संस्थान पूरी तरह स्वेच्छा और मनमर्जी के आधार पर नहीं चल सकते। उनके संचालन के लिए एक वैधानिक व्यवस्था आवश्यक है।

इस कानून की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें प्रशासन को केवल पंजीकरण प्रमाणपत्र जारी करने वाली संस्था नहीं बनाया गया था। उसे निगरानी, निरीक्षण और निर्धारित परिस्थितियों में सुधारात्मक कार्रवाई करने की भूमिका भी दी गई थी।

लेकिन आज सवाल यह है कि इस व्यवस्था का वास्तविक स्वरूप क्या रहा?

क्या प्रदेश में सभी पात्र कोचिंग संस्थानों का पंजीकरण हुआ? क्या प्रत्येक जिले में सक्षम अधिकारियों की पहचान की गई? क्या निरीक्षण की वार्षिक कार्ययोजना बनी? क्या पंजीकृत संस्थानों के रिकॉर्ड नियमित रूप से जांचे गए? क्या बिना पंजीकरण संचालन करने वालों पर लगातार कार्रवाई हुई? क्या अनियमितताओं को दूर करने के लिए समयसीमा निर्धारित की गई? क्या बार-बार उल्लंघन करने वालों के विरुद्ध कठोर कदम उठाए गए?

यदि इन सभी प्रश्नों के उत्तर सकारात्मक हैं, तो सरकार को उनके प्रमाण और आंकड़े सार्वजनिक करने चाहिए। यदि नहीं, तो यह स्वीकार करना होगा कि कानून और उसके क्रियान्वयन के बीच एक गंभीर अंतर बना रहा।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि 2002 के अधिनियम को केवल अग्नि सुरक्षा का संपूर्ण कानून नहीं माना जा सकता। भवन सुरक्षा, अग्निशमन, विद्युत सुरक्षा, नगर नियोजन और भूमि उपयोग से संबंधित अन्य कानूनों तथा नियमों का पालन भी आवश्यक है। लेकिन यही बात इस मामले को और गंभीर बनाती है। कोचिंग संस्थानों के नियमन के साथ-साथ भवन और अग्नि सुरक्षा के लिए अलग-अलग विभागों की जिम्मेदारियां भी पहले से निर्धारित थीं।

इसलिए यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि कोचिंग कानून पुराना हो गया था। पुराने कानून के साथ-साथ अन्य लागू कानूनों का पालन क्यों नहीं हुआ, इसका उत्तर भी सरकार को देना होगा।

24 वर्षों की प्रशासनिक जवाबदेही: सरकार को अपना रिकॉर्ड सार्वजनिक करना चाहिए

किसी भी कानून की सफलता का मूल्यांकन उसके प्रावधानों से अधिक उसके परिणामों से किया जाता है।

यदि कोई कानून 24 वर्षों से लागू है और उसके बाद भी सरकार को उसी क्षेत्र में नई पंजीकरण व्यवस्था, निरीक्षण अभियान और दंडात्मक प्रावधानों की आवश्यकता महसूस होती है, तो सबसे पहले उस कानून की कार्यान्वयन रिपोर्ट सामने आनी चाहिए।

उत्तर प्रदेश सरकार को 2002 से लेकर अब तक की एक विस्तृत समीक्षा सार्वजनिक करनी चाहिए।

इस समीक्षा में यह स्पष्ट होना चाहिए कि प्रदेश में वर्षवार कितने कोचिंग संस्थानों ने पंजीकरण कराया। कितने संस्थान पंजीकरण के बिना संचालित पाए गए। कितने संस्थानों के विरुद्ध नोटिस जारी हुए। कितने मामलों में निरीक्षण किया गया। कितने संस्थानों के पंजीकरण निलंबित या निरस्त किए गए। कितने मामलों में धारा 9 के अंतर्गत आर्थिक दंड लगाया गया। कितने संस्थानों ने निर्धारित कमियों को दूर किया और कितनों के विरुद्ध आगे की कार्रवाई हुई।

इसके साथ ही यह भी बताया जाना चाहिए कि प्रत्येक जिले में कोचिंग संस्थानों के निरीक्षण के लिए किस अधिकारी को जिम्मेदारी दी गई थी। निरीक्षण की आवृत्ति क्या थी? क्या निरीक्षण की कोई निर्धारित प्रक्रिया थी? क्या अधिकारियों को पर्याप्त कर्मचारी और संसाधन उपलब्ध कराए गए थे? क्या विभागीय स्तर पर निरीक्षण की समीक्षा की जाती थी?

यदि किसी जिले में सैकड़ों कोचिंग संस्थान चल रहे थे और वहां वर्षों तक कोई प्रभावी निरीक्षण नहीं हुआ, तो इसका कारण क्या था?

क्या अधिकारियों को संस्थानों की जानकारी नहीं थी? क्या उन्हें पर्याप्त संसाधन नहीं दिए गए थे? क्या विभागीय समन्वय का अभाव था? या फिर निगरानी व्यवस्था केवल कागजों पर चल रही थी?

इन प्रश्नों का उत्तर देना सरकार की जिम्मेदारी है।

क्योंकि किसी कानून को लागू करने की जिम्मेदारी जनता पर नहीं, सरकार और उसके प्रशासनिक तंत्र पर होती है।

दुर्घटना के बाद प्रशासनिक सक्रियता और दुर्घटना से पहले की निष्क्रियता का विरोधाभास

भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में एक ऐसी प्रवृत्ति लंबे समय से दिखाई देती रही है, जिसमें किसी बड़ी दुर्घटना के बाद अचानक व्यापक कार्रवाई शुरू होती है।

पहले बैठकें होती हैं। फिर अधिकारियों को निर्देश दिए जाते हैं। इसके बाद निरीक्षण टीमें गठित होती हैं। संबंधित प्रतिष्ठानों को नोटिस भेजे जाते हैं। कुछ संस्थानों को सील किया जाता है। फिर कार्रवाई की रिपोर्ट तैयार होती है और धीरे-धीरे सार्वजनिक ध्यान किसी अन्य विषय की ओर चला जाता है।

लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न अक्सर अनुत्तरित रह जाता है कि दुर्घटना होने से पहले जिम्मेदार विभाग क्या कर रहे थे?

लखनऊ की घटना के बाद प्रदेश में कोचिंग केंद्रों तथा अन्य प्रतिष्ठानों के निरीक्षण के निर्देश दिए गए। समाचार रिपोर्टों में नोएडा और गाजियाबाद में 60 से अधिक प्रतिष्ठानों को सील किए जाने और गाजियाबाद में 206 प्रतिष्ठानों के पास अग्निशमन विभाग की एनओसी नहीं होने की जानकारी सामने आई।

इन कार्रवाइयों का महत्व अपनी जगह है। लेकिन इनसे प्रशासनिक निगरानी की वास्तविक स्थिति पर गंभीर प्रश्न उठते हैं।

यदि किसी क्षेत्र में बड़ी संख्या में प्रतिष्ठानों के पास आवश्यक अग्नि सुरक्षा संबंधी स्वीकृति नहीं थी, तो क्या यह स्थिति अचानक पैदा हुई? क्या इन प्रतिष्ठानों ने रातोंरात अपने भवनों का उपयोग बदल दिया? क्या वहां विद्यार्थियों और अन्य लोगों का आना-जाना पहले नहीं था? क्या आसपास के नागरिकों और स्थानीय प्रशासन को इन गतिविधियों की जानकारी नहीं थी?

यदि प्रशासन कुछ दिनों के भीतर ऐसे प्रतिष्ठानों की पहचान कर सकता है, तो दुर्घटना से पहले ऐसा क्यों नहीं किया गया?

यही वह अंतर है जो प्रशासनिक प्रतिक्रिया और वास्तविक सुशासन के बीच होता है।

प्रशासनिक कार्रवाई का अर्थ केवल घटना के बाद संस्थानों को सील करना नहीं है। उसका सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य उन परिस्थितियों को समाप्त करना है जिनसे दुर्घटना होने की संभावना पैदा होती है।

यदि किसी भवन में अग्नि सुरक्षा का इंतजाम नहीं है, तो उसे दुर्घटना होने के बाद नहीं, बल्कि खतरे की पहचान होते ही निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुसार सुरक्षित या अनुपालन योग्य बनाया जाना चाहिए।

यदि कोई भवन स्वीकृत उपयोग के विपरीत चल रहा है, तो संबंधित प्राधिकरण को समय रहते कार्रवाई करनी चाहिए।

यदि किसी संस्थान में निर्धारित क्षमता से अधिक विद्यार्थियों को बैठाया जा रहा है, तो उसका पता नियमित निरीक्षण में चलना चाहिए।

यदि आपातकालीन निकास बंद हैं, तो उनका खुला होना दुर्घटना के बाद जांच का विषय नहीं, बल्कि नियमित सुरक्षा निरीक्षण का विषय होना चाहिए।

इसलिए किसी भी जिले के प्रशासनिक प्रदर्शन का मूल्यांकन केवल इस बात से नहीं होना चाहिए कि उसने हादसे के बाद कितने संस्थान सील किए। उसका मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि उसने हादसे से पहले कितने संभावित खतरों की पहचान कर उन्हें समाप्त किया।

लखनऊ अग्निकांड: भवन की चारदीवारी के भीतर नहीं, पूरी व्यवस्था के सामने खड़े सवाल

लखनऊ की आग की घटना को केवल एक दुर्घटना के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इससे जुड़े तथ्यों, भवन के उपयोग और विभिन्न संस्थानों की भूमिका की निष्पक्ष जांच आवश्यक है।

प्रारंभिक समाचार रिपोर्टों में घटना में कम से कम 15 लोगों की मौत की जानकारी सामने आई। भवन में विभिन्न प्रकार की गतिविधियां संचालित होने की बात भी सामने आई। इसलिए घटना की जिम्मेदारी तय करते समय यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि भवन में कौन-कौन से संस्थान संचालित थे, उनकी गतिविधियां क्या थीं और किस संस्था के संचालन से कौन-सा कानूनी दायित्व जुड़ा था।

लेकिन जांच की प्रक्रिया के साथ-साथ व्यापक सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़े सवालों को भी उठाना जरूरी है।

क्या भवन का उपयोग उस प्रकार की शैक्षणिक अथवा व्यावसायिक गतिविधियों के लिए स्वीकृत था?

क्या भवन की संरचना उसमें आने-जाने वाले लोगों की संख्या के अनुरूप थी?

क्या पर्याप्त और सुरक्षित निकास मार्ग उपलब्ध थे?

क्या आपातकालीन सीढ़ियां और गलियारे अवरोधमुक्त थे?

क्या अग्निशमन उपकरण उपलब्ध थे और क्या वे कार्यशील स्थिति में थे?

क्या अग्नि चेतावनी प्रणाली स्थापित थी?

क्या बिजली की वायरिंग का निरीक्षण कराया गया था?

क्या भवन में अग्निशमन विभाग की आवश्यक स्वीकृति थी?

क्या वहां काम करने वाले कर्मचारियों और पढ़ने वाले विद्यार्थियों को आपातकालीन निकासी का प्रशिक्षण दिया गया था?

क्या किसी पूर्व निरीक्षण में कमियां सामने आई थीं?

क्या भवन के संबंध में कोई शिकायत प्राप्त हुई थी?

इन सभी प्रश्नों का उत्तर आधिकारिक जांच और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर सामने आना चाहिए।

यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना आवश्यक है। अग्नि सुरक्षा का उद्देश्य केवल आग बुझाने के लिए उपकरण उपलब्ध कराना नहीं है। उसका उद्देश्य आग लगने की संभावना को कम करना, आग की शुरुआती स्थिति का पता लगाना, लोगों को सुरक्षित बाहर निकालना और आपातकालीन सेवाओं को प्रभावी ढंग से काम करने का अवसर देना है।

यदि किसी भवन में पर्याप्त निकास मार्ग नहीं हैं, तो वहां महंगे अग्निशमन उपकरण भी लोगों की जान बचाने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकते।

यदि आपातकालीन रास्ते बंद हैं, तो भवन का व्यावसायिक या शैक्षणिक उपयोग अत्यंत जोखिमपूर्ण हो सकता है।

यदि भवन की अधिकृत क्षमता से अधिक लोगों को बैठाया जा रहा है, तो निकासी की स्थिति और गंभीर हो सकती है।

इसलिए भवन सुरक्षा का मूल्यांकन केवल किसी प्रमाणपत्र या दीवार पर लगे अग्निशमन यंत्र को देखकर नहीं किया जा सकता। इसके लिए वास्तविक तकनीकी निरीक्षण और निर्धारित मानकों का पालन आवश्यक है।

शहरी नियोजन की विफलता: आवासीय भवनों में शिक्षा का कारोबार कैसे फैलता गया?

कोचिंग उद्योग की समस्या का एक बड़ा हिस्सा शहरी नियोजन और भवन उपयोग से भी जुड़ा हुआ है।

उत्तर प्रदेश के अनेक शहरों में तेजी से बढ़ते व्यावसायिक और शैक्षणिक गतिविधियों के कारण आवासीय एवं अन्य प्रकार के भवनों में कोचिंग केंद्र, प्रशिक्षण संस्थान, छात्रावास और अन्य व्यावसायिक गतिविधियां संचालित होने लगी हैं।

कई बार भवन का मूल उपयोग कुछ और होता है, लेकिन धीरे-धीरे वहां व्यावसायिक गतिविधियां शुरू हो जाती हैं। भवन के एक हिस्से में कक्षाएं चलने लगती हैं, दूसरे हिस्से में कार्यालय बन जाता है और तीसरे हिस्से में विद्यार्थियों की आवाजाही बढ़ जाती है।

इस बदलाव के साथ भवन की वास्तविक क्षमता, पार्किंग, आपातकालीन निकास, अग्नि सुरक्षा और विद्युत भार जैसे विषयों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता।

यहां सवाल केवल कोचिंग संचालक का नहीं है। सवाल उन नगर निकायों और विकास प्राधिकरणों का भी है, जिनकी जिम्मेदारी शहरों के नियोजित विकास और भवनों के स्वीकृत उपयोग की निगरानी करना है।

किसी भवन का निर्माण जिस उद्देश्य से स्वीकृत हुआ है, उससे अलग उद्देश्य के लिए उसका इस्तेमाल होने पर लागू नियमों के अनुसार अनुमति और सुरक्षा संबंधी शर्तों का पालन आवश्यक होता है।

यदि आवासीय भवनों में बड़ी संख्या में विद्यार्थियों को बैठाया जा रहा है, तो यह जांचना आवश्यक है कि वहां ऐसी गतिविधि की अनुमति है या नहीं।

यदि किसी भवन में कई संस्थान एक साथ संचालित हो रहे हैं, तो यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि कुल लोगों की संख्या कितनी है और आपातकालीन परिस्थितियों में सभी को सुरक्षित निकालने की व्यवस्था कैसी है।

यदि किसी बाजार या व्यावसायिक क्षेत्र में बड़ी संख्या में कोचिंग केंद्र हैं, तो स्थानीय प्रशासन और अग्निशमन विभाग को उस पूरे क्षेत्र की सामूहिक सुरक्षा का भी आकलन करना चाहिए।

यह केवल अलग-अलग प्रतिष्ठानों का मामला नहीं है। यह शहरी सुरक्षा नियोजन का विषय है।

सरकार को प्रत्येक शहर में ऐसे क्षेत्रों की पहचान करनी चाहिए जहां बड़ी संख्या में विद्यार्थी और अन्य लोग नियमित रूप से एकत्र होते हैं। इन क्षेत्रों में भवनों की उपयुक्तता, अग्नि सुरक्षा, यातायात, पार्किंग, आपातकालीन पहुंच और निकासी की व्यवस्था का समग्र मूल्यांकन होना चाहिए।

50 विद्यार्थियों की सीमा: क्या सुरक्षा का अधिकार संख्या के आधार पर तय होगा?

प्रस्तावित अध्यादेश में 50 से अधिक विद्यार्थियों वाले कोचिंग संस्थानों के लिए पंजीकरण अनिवार्य किए जाने की खबर सामने आई है।

यह प्रस्ताव अपने आप में एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न पैदा करता है।

यदि किसी कोचिंग संस्थान में 49 विद्यार्थी हैं, तो क्या वह सुरक्षित है? क्या 50 से कम विद्यार्थियों वाले संस्थानों में आग नहीं लग सकती? क्या वहां विद्युत दुर्घटना नहीं हो सकती? क्या वहां आपातकालीन निकास की आवश्यकता नहीं होती?

सुरक्षा का संबंध विद्यार्थियों की संख्या से अधिक भवन की स्थिति और गतिविधियों की प्रकृति से है।

एक छोटी कक्षा में भी यदि एकमात्र निकास द्वार अवरुद्ध है, तो दुर्घटना की स्थिति में वहां मौजूद सभी विद्यार्थियों का जीवन संकट में पड़ सकता है।

इसके विपरीत, एक बड़े संस्थान में उचित भवन, पर्याप्त निकास, निर्धारित क्षमता, प्रशिक्षित कर्मचारी और कार्यशील सुरक्षा प्रणाली होने पर जोखिम को बेहतर ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है।

इसलिए पंजीकरण और अग्नि सुरक्षा के मानकों को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखना आवश्यक है।

यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि 50 विद्यार्थियों की सीमा केवल किसी नई पंजीकरण श्रेणी का आधार होगी या इससे छोटे संस्थानों को पंजीकरण से छूट मिलेगी। यदि छूट दी जाती है, तो उसका वर्ष 2002 के अधिनियम की मौजूदा व्यवस्था से क्या संबंध होगा?

क्योंकि पुराने अधिनियम की धारा 2 में कोचिंग की परिभाषा तीन या उससे अधिक व्यक्तियों को अध्यापन, शिक्षण अथवा मार्गदर्शन प्रदान करने से संबंधित है और धारा 3 में पंजीकरण का प्रावधान मौजूद है।

सरकार को नए अध्यादेश में इन दोनों व्यवस्थाओं के बीच कानूनी सामंजस्य स्पष्ट करना होगा।

अन्यथा यह आशंका बनी रहेगी कि छोटे संस्थान विद्यार्थियों को अलग-अलग बैचों में दिखाकर, अलग-अलग नामों से इकाइयां बनाकर या अन्य प्रशासनिक तरीकों से पंजीकरण की बाध्यता से बचने का प्रयास कर सकते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि विद्यार्थियों की सुरक्षा किसी संस्थान के आकार पर निर्भर नहीं होनी चाहिए।

कोचिंग उद्योग का बदलता स्वरूप: शिक्षा से व्यवसाय और व्यवसाय से संगठित बाजार तक

वर्ष 2002 और वर्ष 2026 के बीच कोचिंग उद्योग में व्यापक परिवर्तन हुआ है।

दो दशक पहले कोचिंग मुख्य रूप से निजी ट्यूशन, छोटे शिक्षण केंद्रों और सीमित स्तर पर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने वाले संस्थानों तक केंद्रित थी।

आज कोचिंग उद्योग एक विशाल व्यावसायिक क्षेत्र बन चुका है। इसमें बड़े राष्ट्रीय ब्रांड, क्षेत्रीय नेटवर्क, फ्रेंचाइजी, ऑनलाइन शिक्षा मंच, ऑफलाइन शिक्षण केंद्र, छात्रावास, पुस्तक एवं अध्ययन सामग्री विक्रेता और विभिन्न प्रकार की सहायक सेवाएं शामिल हैं।

इस उद्योग में विद्यार्थियों की संख्या, शुल्क संग्रह, विज्ञापन और व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा का पैमाना काफी बदल चुका है।

कई संस्थान एक ही शहर में अनेक केंद्र संचालित करते हैं। कुछ संस्थान हजारों विद्यार्थियों के लिए एक साथ शिक्षण कार्यक्रम चलाते हैं। कुछ स्थानों पर बड़े-बड़े व्यावसायिक भवनों में कई अलग-अलग संस्थानों की गतिविधियां संचालित होती हैं।

इस बदलाव ने शिक्षा को अधिक सुलभ बनाने के अवसर भी पैदा किए हैं, लेकिन इसके साथ अनेक नए जोखिम भी सामने आए हैं।

पहला जोखिम है क्षमता से अधिक विद्यार्थियों को बैठाना। दूसरा जोखिम है भवनों के मूल उपयोग में परिवर्तन। तीसरा जोखिम है शिक्षा की गुणवत्ता और शिक्षक योग्यता पर अपर्याप्त निगरानी। चौथा जोखिम है फीस और अन्य शुल्कों में पारदर्शिता का अभाव। पांचवां जोखिम है विज्ञापन के माध्यम से सफलता की अवास्तविक तस्वीर प्रस्तुत करना।

किसी भी उद्योग के विस्तार के साथ नियमन का विकास भी होना चाहिए। लेकिन यदि उद्योग का विस्तार तेजी से हो और सरकारी निगरानी उसी पुराने ढांचे में सीमित रह जाए, तो नियामक अंतराल पैदा होता है।

उत्तर प्रदेश में आज यही प्रश्न गंभीरता से उठाया जाना चाहिए कि क्या 2002 में तैयार किया गया प्रशासनिक ढांचा 2026 के कोचिंग उद्योग की वास्तविक जटिलताओं को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त है?

यदि नहीं, तो कानून में सुधार आवश्यक है। लेकिन यदि पुराने कानून के प्रावधानों का ही पालन नहीं हुआ, तो केवल नया कानून बनाकर समस्या समाप्त होने की उम्मीद नहीं की जा सकती।

विद्यार्थियों और अभिभावकों का आर्थिक शोषण: शिक्षा के नाम पर उम्मीदों का बाजार

कोचिंग उद्योग का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष आर्थिक और व्यावसायिक पारदर्शिता है।

भारत में सरकारी नौकरी, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, प्रबंधन और प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश को सामाजिक एवं आर्थिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है।

लाखों परिवार अपने बच्चों को बेहतर अवसर देने के लिए कोचिंग संस्थानों पर निर्भर करते हैं।

कई अभिभावक अपनी सीमित आय में से बड़ी राशि निकालते हैं। कुछ लोग कर्ज लेते हैं। कुछ अपनी बचत खर्च कर देते हैं। कुछ परिवार बच्चों को दूसरे शहरों में भेजकर उनके रहने, खाने और पढ़ाई का पूरा खर्च उठाते हैं।

इस आर्थिक त्याग के पीछे एक ही उम्मीद होती है कि बच्चे को बेहतर शिक्षा और भविष्य के लिए उचित मार्गदर्शन मिलेगा।

लेकिन इस उम्मीद के साथ कोचिंग उद्योग में व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा भी जुड़ गई है।

कई संस्थान अपने विज्ञापनों में चयनित विद्यार्थियों की संख्या, रैंक और सफलता की कहानियों को प्रमुखता से दिखाते हैं। लेकिन आम अभिभावक के लिए यह जानना कठिन होता है कि किसी संस्थान का वास्तविक चयन अनुपात क्या है, कितने विद्यार्थियों ने पूरा पाठ्यक्रम किया, कितने विद्यार्थियों ने बीच में पढ़ाई छोड़ी और विज्ञापित परिणामों में संस्थान की वास्तविक भूमिका कितनी थी।

किसी संस्थान का चयन संबंधी दावा अपने आप में गलत नहीं है। लेकिन यदि विज्ञापन अधूरी या भ्रामक जानकारी के आधार पर तैयार किए जाते हैं, तो यह विद्यार्थियों और अभिभावकों के निर्णय को प्रभावित कर सकता है।

फीस की संरचना भी महत्वपूर्ण विषय है।

प्रवेश शुल्क, पाठ्यक्रम शुल्क, परीक्षा शुल्क, अध्ययन सामग्री, टेस्ट सीरीज और अन्य सुविधाओं के नाम पर अलग-अलग राशि ली जा सकती है। यदि प्रवेश के समय पूरी जानकारी उपलब्ध न हो, तो परिवारों के लिए वास्तविक खर्च का अनुमान लगाना मुश्किल हो जाता है।

इसके अलावा पाठ्यक्रम बीच में छोड़ने, संस्थान बदलने या किसी कारण से शिक्षा जारी न रख पाने की स्थिति में फीस वापसी का प्रश्न उत्पन्न होता है।

इसलिए नए कानून में फीस की पारदर्शिता, भुगतान की रसीद, शुल्क का सार्वजनिक विवरण, रिफंड की उचित नीति और अनिवार्य अध्ययन सामग्री की स्पष्ट लागत निर्धारित करने की व्यवस्था होनी चाहिए।

सरकार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी संस्थान द्वारा किसी पुस्तक, नोट्स या अध्ययन सामग्री को अनिवार्य बताकर अनुचित अतिरिक्त शुल्क न वसूला जाए।

कोचिंग संस्थानों को अपनी व्यावसायिक लागत और लाभ कमाने का अधिकार है, लेकिन विद्यार्थियों को अपारदर्शी और अनुचित वसूली का शिकार नहीं बनाया जा सकता।

शिक्षकों की योग्यता: डिग्री के साथ शिक्षण क्षमता और जवाबदेही भी जरूरी

प्रस्तावित अध्यादेश में स्नातक से कम शैक्षणिक योग्यता वाले व्यक्तियों को शिक्षक नियुक्त न करने की व्यवस्था की चर्चा है।

यह विषय भी व्यापक विचार की मांग करता है।

न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता निर्धारित करना शिक्षण की गुणवत्ता के लिए एक आधारभूत कदम हो सकता है। लेकिन किसी व्यक्ति के पास स्नातक की डिग्री होने मात्र से यह सुनिश्चित नहीं हो जाता कि वह प्रभावी शिक्षक भी है।

शिक्षण केवल विषय का ज्ञान रखने का नाम नहीं है। इसमें विषय को सरलता से समझाने, विद्यार्थियों की कठिनाइयों को पहचानने, प्रश्नों का समाधान करने और सीखने की प्रक्रिया को व्यवस्थित बनाने की क्षमता भी शामिल है।

इसलिए सरकार को शिक्षक योग्यता के साथ अनुभव, विषयगत दक्षता, प्रशिक्षण और संस्थान द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले शिक्षकों की वास्तविक जानकारी पर भी ध्यान देना चाहिए।

इसके साथ यह भी जरूरी है कि संस्थान अपने विज्ञापन में जिन शिक्षकों के नाम और योग्यता का उल्लेख करते हैं, वास्तविक कक्षाएं उन्हीं शिक्षकों द्वारा संचालित हों।

कई बार संस्थानों की प्रचार सामग्री में प्रसिद्ध शिक्षकों को दिखाया जाता है, जबकि नियमित कक्षाओं में अलग-अलग या कम अनुभवी शिक्षक पढ़ाते हैं। ऐसे मामलों में पारदर्शिता सुनिश्चित करना विद्यार्थियों का अधिकार होना चाहिए।

शिक्षा की गुणवत्ता को केवल भवन, पंजीकरण और फीस से नहीं मापा जा सकता। शिक्षक की क्षमता और विद्यार्थी को मिलने वाली वास्तविक शैक्षणिक सहायता भी नियमन का हिस्सा होनी चाहिए।

मानसिक स्वास्थ्य और कोचिंग संस्कृति: केवल शारीरिक सुरक्षा पर्याप्त नहीं

कोचिंग संस्थानों की चर्चा में अक्सर भवन और अग्नि सुरक्षा को प्रमुखता दी जाती है, लेकिन विद्यार्थियों की मानसिक सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले अनेक विद्यार्थी कम उम्र में घर छोड़कर दूसरे शहरों में रहते हैं। उनके सामने पढ़ाई, प्रतिस्पर्धा, परिवार की अपेक्षाओं और आर्थिक दबाव का संयुक्त प्रभाव होता है।

कई विद्यार्थियों को लगातार यह महसूस कराया जाता है कि सफलता ही उनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य है। असफलता को सामान्य शैक्षणिक प्रक्रिया के बजाय व्यक्तिगत पराजय के रूप में देखा जाने लगता है।

कुछ संस्थानों में अत्यधिक प्रतिस्पर्धी वातावरण, सार्वजनिक रैंकिंग, अपमानजनक व्यवहार और अवास्तविक अपेक्षाएं विद्यार्थियों पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती हैं।

इसलिए कोचिंग विनियमन का उद्देश्य केवल संस्थानों की व्यावसायिक गतिविधियों को नियंत्रित करना नहीं होना चाहिए। विद्यार्थियों के सम्मान, मानसिक स्वास्थ्य और शिकायत निवारण को भी इसमें स्थान मिलना चाहिए।

प्रत्येक बड़े संस्थान में विद्यार्थियों के लिए स्वतंत्र शिकायत व्यवस्था, परामर्श की सुविधा और उत्पीड़न से संरक्षण के उपाय होने चाहिए।

अभिभावकों को भी यह अधिकार होना चाहिए कि वे अपने बच्चों की शैक्षणिक स्थिति और संस्थान की शिकायत व्यवस्था के बारे में आवश्यक जानकारी प्राप्त कर सकें।

विद्यार्थियों को केवल फीस देने वाले ग्राहक के रूप में देखना शिक्षा के मूल उद्देश्य को कमजोर करता है।

नौकरशाही की जवाबदेही: क्या अधिकारी केवल आदेश जारी करने के लिए हैं?

इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण पहलू सरकारी अधिकारियों की जवाबदेही है।

किसी भी संस्थान के संचालन में कई विभागों की भूमिका हो सकती है। कोचिंग पंजीकरण की जिम्मेदारी अलग अधिकारी के पास हो सकती है। भवन का स्वीकृत उपयोग विकास प्राधिकरण या नगर निकाय के अधिकार क्षेत्र में हो सकता है। अग्नि सुरक्षा का निरीक्षण अग्निशमन विभाग करता है। विद्युत सुरक्षा से संबंधित जांच अलग प्राधिकरण के अधीन हो सकती है।

लेकिन जब किसी भवन में गंभीर दुर्घटना होती है, तब अक्सर विभागों के बीच जिम्मेदारी का हस्तांतरण शुरू हो जाता है।

एक विभाग कह सकता है कि उसे भवन के उपयोग की जानकारी नहीं थी। दूसरा कह सकता है कि अग्नि सुरक्षा का प्रमाणपत्र उसकी जिम्मेदारी थी। तीसरा कह सकता है कि पंजीकरण उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता था।

ऐसे में मूल प्रश्न पीछे छूट जाता है कि आखिर पूरी व्यवस्था में किसी एक स्तर पर समन्वित निगरानी क्यों नहीं थी?

सरकार को इस समस्या का स्थायी समाधान करना होगा।

प्रत्येक जिले में कोचिंग संस्थानों के पंजीकरण, भवन सुरक्षा, अग्निशमन अनुपालन और निरीक्षण के लिए स्पष्ट जिम्मेदारियां निर्धारित होनी चाहिए।

किस अधिकारी को क्या जांचना है, कितनी अवधि में जांच करनी है, निरीक्षण की रिपोर्ट किसे भेजनी है, कमियों को कितने समय में दूर कराना है और अनुपालन की पुष्टि कौन करेगा—इन सभी बातों का स्पष्ट निर्धारण होना चाहिए।

इसके साथ यह भी जरूरी है कि अधिकारियों के कार्य का मूल्यांकन केवल जारी किए गए नोटिसों की संख्या से न किया जाए।

उनके प्रदर्शन का आकलन इस आधार पर होना चाहिए कि कितने संस्थानों ने सुरक्षा मानकों का पालन किया, कितनी गंभीर कमियों को समय रहते दूर कराया गया और कितनी शिकायतों का समाधान हुआ।

जहां किसी अधिकारी की जानबूझकर लापरवाही, मिलीभगत, भ्रष्टाचार या वैधानिक जिम्मेदारी की गंभीर उपेक्षा प्रमाणित हो, वहां उसके विरुद्ध भी नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।

सरकारी कर्मचारी और अधिकारी किसी भी कानून से ऊपर नहीं हैं। सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़े मामलों में उनकी जवाबदेही और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।

हालांकि, किसी अधिकारी को केवल इसलिए दोषी नहीं माना जा सकता कि उसके क्षेत्र में कोई दुर्घटना हुई। व्यक्तिगत जिम्मेदारी का निर्धारण दस्तावेजों, आदेशों, निरीक्षण रिपोर्टों, शिकायतों और जांच के निष्कर्षों के आधार पर होना चाहिए।

लेकिन जांच की निष्पक्षता का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि प्रशासनिक जिम्मेदारी के प्रश्न को ही छोड़ दिया जाए।

क्या सरकारी तंत्र में विभागीय समन्वय की कमी भी समस्या है?

कोचिंग संस्थानों का नियमन एक बहु-विभागीय विषय है।

यदि शिक्षा विभाग पंजीकरण करता है, तो उसे भवन की वास्तविक सुरक्षा की जानकारी कैसे मिलेगी? यदि अग्निशमन विभाग निरीक्षण करता है, तो क्या उसे संस्थान में विद्यार्थियों की वास्तविक संख्या और संचालन की प्रकृति की जानकारी होती है? यदि विकास प्राधिकरण भवन के उपयोग की स्वीकृति देता है, तो क्या उसे वहां संचालित होने वाली शैक्षणिक गतिविधियों के बारे में नियमित सूचना मिलती है?

इन विभागों के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान कितना प्रभावी है?

यदि एक संस्थान का पंजीकरण किसी विभाग के पास है, लेकिन उसका भवन सुरक्षा मानकों का पालन नहीं करता, तो दूसरे विभाग की रिपोर्ट पहले विभाग तक कैसे पहुंचेगी?

यदि अग्निशमन विभाग किसी संस्थान में गंभीर कमी दर्ज करता है, तो उस पर आगे की कार्रवाई कौन करेगा?

यदि किसी भवन को असुरक्षित घोषित किया जाता है, तो क्या संबंधित कोचिंग पंजीकरण स्वतः समीक्षा के दायरे में आएगा?

ये ऐसे प्रश्न हैं जिनका समाधान एकीकृत प्रशासनिक व्यवस्था से ही संभव है।

प्रत्येक जिले में एक समन्वित डिजिटल रिकॉर्ड होना चाहिए, जिसमें संस्थान का पंजीकरण, पता, स्वीकृत भवन उपयोग, अधिकृत क्षमता, अग्नि सुरक्षा की स्थिति, निरीक्षण की तारीख और अनुपालन की स्थिति दर्ज हो।

इससे विभागों के बीच जानकारी का अंतर कम होगा और नागरिकों को भी संस्थान की वैध स्थिति जानने का अवसर मिलेगा।

2024 के केंद्रीय दिशानिर्देश और 2026 का प्रस्ताव: क्या राज्य सरकार ने पहले से उपलब्ध व्यवस्था का मूल्यांकन किया?

कोचिंग संस्थानों के नियमन का प्रश्न केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है।

केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने 16 जनवरी 2024 को कोचिंग केंद्रों के नियमन के संबंध में राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को दिशानिर्देश जारी किए थे।

इन दिशानिर्देशों का उद्देश्य कोचिंग संस्थानों के संचालन में पारदर्शिता, विद्यार्थियों के हितों की रक्षा, शैक्षणिक गुणवत्ता और अन्य आवश्यक मानकों को बेहतर बनाना था।

अगस्त 2026 में केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की संसदीय जानकारी में भी कोचिंग केंद्रों से जुड़ी समस्याओं के रूप में अत्यधिक फीस, अनियमित संचालन, आग और दुर्घटनाओं में मौत, मानसिक स्वास्थ्य तथा अन्य चिंताओं का उल्लेख किया गया।

इससे यह स्पष्ट है कि केंद्र सरकार भी कोचिंग उद्योग के बढ़ते व्यावसायीकरण और उससे उत्पन्न जोखिमों को स्वीकार कर चुकी है।

लेकिन उत्तर प्रदेश के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि इन केंद्रीय दिशानिर्देशों और वर्ष 2002 के राज्य अधिनियम के बीच क्या संबंध स्थापित किया गया?

क्या राज्य ने 2024 के दिशानिर्देशों के बाद अपने मौजूदा कानून की समीक्षा की थी?

क्या कोचिंग संस्थानों के पंजीकरण और निरीक्षण की व्यवस्था में सुधार किया गया था?

क्या सभी जिलों को स्पष्ट निर्देश दिए गए थे?

क्या जिला स्तर पर अनुपालन रिपोर्ट तैयार हुई?

यदि ये सभी व्यवस्थाएं मौजूद थीं, तो 2026 में नए अध्यादेश की आवश्यकता क्यों महसूस हुई?

यदि नहीं थीं, तो यह स्वीकार करना होगा कि समस्या केवल कानून की नहीं, बल्कि नीतिगत प्राथमिकताओं और प्रशासनिक क्रियान्वयन की भी थी।

नए अध्यादेश की वास्तविक परीक्षा: कागज पर नियम नहीं, जमीन पर परिणाम

यदि उत्तर प्रदेश सरकार वास्तव में कोचिंग उद्योग में सुधार करना चाहती है, तो प्रस्तावित अध्यादेश को केवल पंजीकरण और आर्थिक दंड तक सीमित नहीं रखना चाहिए।

इसमें संस्थानों के पूरे संचालन को जवाबदेह बनाने की व्यवस्था होनी चाहिए।

सबसे पहले, पंजीकरण की व्यवस्था स्पष्ट और पारदर्शी हो। पात्र संस्थानों का पंजीकरण सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध हो और नागरिक किसी भी संस्थान की वैध स्थिति जांच सकें।

दूसरे, भवन की उपयुक्तता और स्वीकृत उपयोग का सत्यापन अनिवार्य हो। किसी भी संस्थान को ऐसी जगह संचालित होने की अनुमति नहीं होनी चाहिए जहां निर्धारित गतिविधि के लिए आवश्यक सुरक्षा और भवन मानक पूरे न होते हों।

तीसरे, अग्नि सुरक्षा और आपातकालीन निकासी की नियमित जांच हो। केवल उपकरण उपलब्ध होने की पुष्टि पर्याप्त न हो। यह भी देखा जाए कि वे काम कर रहे हैं, निकास मार्ग खुले हैं और कर्मचारियों को आपातकालीन स्थिति में क्या करना है इसकी जानकारी है।

चौथे, विद्युत सुरक्षा का नियमित निरीक्षण हो। असुरक्षित वायरिंग और अनधिकृत विद्युत भार जैसी कमियों की पहचान समय रहते होनी चाहिए।

पांचवें, विद्यार्थियों की संख्या भवन की स्वीकृत क्षमता और सुरक्षा व्यवस्था के अनुसार निर्धारित हो।

छठे, फीस और अध्ययन सामग्री की लागत सार्वजनिक की जाए। किसी भी प्रकार की अतिरिक्त वसूली पर पारदर्शी नियम लागू हों।

सातवें, शिक्षकों की योग्यता और संस्थान द्वारा प्रचारित शैक्षणिक सुविधाओं की सत्यता सुनिश्चित हो।

आठवें, विद्यार्थियों के लिए स्वतंत्र शिकायत निवारण व्यवस्था हो।

नौवें, प्रत्येक संस्थान के निरीक्षण की रिपोर्ट और अनुपालन की स्थिति सार्वजनिक की जाए, ताकि नियमन केवल विभागीय फाइलों तक सीमित न रहे।

दसवें, नियमों के बार-बार उल्लंघन पर कठोर कार्रवाई हो और जहां गंभीर लापरवाही के कारण जान-माल का नुकसान हुआ हो, वहां लागू कानूनों के तहत उचित दंडात्मक कार्रवाई की जाए।

सबसे महत्वपूर्ण यह है कि नए अध्यादेश में पुराने कानून के साथ स्पष्ट सामंजस्य हो। दो अलग-अलग कानूनों के बीच अधिकारों, पंजीकरण की सीमा और सक्षम अधिकारियों की जिम्मेदारियों को लेकर भ्रम पैदा नहीं होना चाहिए।

केवल जुर्माना पर्याप्त नहीं: आर्थिक दंड की प्रभावशीलता भी तय करनी होगी

प्रस्तावित अध्यादेश में 50 हजार से लेकर 1.50 लाख रुपये तक जुर्माने की चर्चा है।

लेकिन क्या इतनी राशि बड़े व्यावसायिक कोचिंग संस्थानों के लिए पर्याप्त निवारक साबित होगी?

यदि कोई संस्थान लाखों या करोड़ों रुपये का कारोबार कर रहा है, तो उसके लिए सीमित जुर्माना केवल एक सामान्य व्यावसायिक खर्च बन सकता है।

दूसरी ओर, छोटे संस्थानों के लिए यही राशि भारी आर्थिक बोझ बन सकती है।

इसलिए दंड का निर्धारण उल्लंघन की प्रकृति, उसकी गंभीरता, संस्थान के आकार और दोहराए गए उल्लंघनों को ध्यान में रखकर होना चाहिए।

सुरक्षा मानकों के मामूली उल्लंघन और जानबूझकर गंभीर जोखिम पैदा करने के बीच अंतर किया जाना चाहिए।

पहली बार हुई सामान्य कमी को सुधारने का अवसर दिया जा सकता है, बशर्ते उससे तत्काल सुरक्षा जोखिम न हो। लेकिन यदि निकास मार्ग बंद हैं, भवन असुरक्षित है या संस्थान जानबूझकर अधिकृत क्षमता से अधिक लोगों को बैठा रहा है, तो तत्काल सुरक्षा संबंधी कार्रवाई आवश्यक हो सकती है।

बार-बार उल्लंघन करने वाले संस्थानों के लिए पंजीकरण निलंबन, निरस्तीकरण और संचालन बंद करने की व्यवस्था प्रभावी होनी चाहिए।

यदि किसी घटना में मृत्यु या गंभीर चोट हुई है, तो मामले के तथ्यों के अनुसार आपराधिक जिम्मेदारी भी निर्धारित की जानी चाहिए।

आर्थिक जुर्माना कभी भी मानव जीवन की कीमत का विकल्प नहीं हो सकता।

असली समस्या कानून की कमी है या कानून लागू करने की इच्छाशक्ति का अभाव?

यह प्रश्न पूरे मामले के केंद्र में है।

भारत में अनेक क्षेत्रों के लिए कानून, नियम और नियामक संस्थाएं मौजूद हैं। भवन निर्माण के नियम हैं। अग्निशमन के मानक हैं। विद्युत सुरक्षा के प्रावधान हैं। नगर नियोजन की व्यवस्था है। शिक्षा संस्थानों के संचालन से जुड़े नियम हैं।

इसके बावजूद जब किसी बड़ी दुर्घटना के बाद गंभीर अनियमितताएं सामने आती हैं, तो स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि पहले से उपलब्ध व्यवस्थाएं प्रभावी क्यों नहीं थीं।

किसी भी राज्य की प्रशासनिक क्षमता केवल इस बात से नहीं मापी जाती कि वह कितने कानून बनाता है। उसकी असली क्षमता इस बात में दिखाई देती है कि वह उन कानूनों को आम नागरिक की सुरक्षा में किस हद तक बदल पाता है।

यदि किसी शहर में भवन सुरक्षा के नियम हैं, लेकिन उनका पालन नहीं हो रहा, तो समस्या केवल नियमों की नहीं है।

यदि अग्निशमन विभाग के पास निरीक्षण का अधिकार है, लेकिन असुरक्षित भवन वर्षों तक संचालित होते रहते हैं, तो समस्या केवल अधिकारों की नहीं है।

यदि शिक्षा विभाग को कोचिंग संस्थानों का पंजीकरण करना है, लेकिन बिना पंजीकरण संस्थान संचालित होते रहते हैं, तो समस्या केवल पंजीकरण प्रक्रिया की नहीं है।

और यदि हर बड़ी घटना के बाद नए नियमों की घोषणा होती है, लेकिन कुछ समय बाद वही समस्याएं फिर सामने आती हैं, तो यह शासन की संस्थागत कमजोरी का संकेत है।

सरकार को इस बार केवल यह नहीं बताना चाहिए कि उसने क्या नया कानून बनाने का निर्णय लिया है। उसे यह भी बताना चाहिए कि पुराने कानून को लागू करने में कौन-सी बाधाएं थीं और उन्हें दूर करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।

मीडिया, नागरिक समाज और जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण

इस प्रकार की घटनाओं में मीडिया की भूमिका केवल दुर्घटना की खबर प्रकाशित करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए।

मीडिया को यह भी पूछना चाहिए कि संबंधित भवन को अनुमति किसने दी, निरीक्षण कब हुआ, पंजीकरण की स्थिति क्या थी, पहले कोई शिकायत आई थी या नहीं और जांच में किन विभागों की भूमिका सामने आई।

दुर्घटना के बाद कुछ दिनों तक व्यापक चर्चा होती है, लेकिन उसके बाद जांच की प्रगति, कार्रवाई और जिम्मेदारी के प्रश्न अक्सर सार्वजनिक विमर्श से बाहर हो जाते हैं।

इसलिए मीडिया को लगातार निगरानी करनी चाहिए कि जांच रिपोर्ट कब आई, उसकी सिफारिशों पर क्या कार्रवाई हुई और क्या भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए वास्तविक सुधार किए गए।

विधानसभा में जनप्रतिनिधियों को भी सरकार से स्पष्ट प्रश्न पूछने चाहिए। वर्ष 2002 के अधिनियम के क्रियान्वयन पर श्वेतपत्र जारी करने की मांग होनी चाहिए। प्रत्येक जिले की स्थिति सदन के सामने रखी जानी चाहिए।

नागरिक संगठनों, अभिभावक समूहों और विद्यार्थियों को भी अपनी शिकायतें दर्ज कराने और संस्थानों की सुरक्षा संबंधी जानकारी प्राप्त करने का अधिकार मिलना चाहिए।

सार्वजनिक सुरक्षा का प्रश्न किसी एक विभाग या सरकार का आंतरिक विषय नहीं है। यह नागरिकों के जीवन और अधिकारों से जुड़ा विषय है।

उत्तर प्रदेश सरकार के सामने दस बुनियादी प्रश्न

इस पूरे मामले में प्रदेश सरकार को निम्नलिखित प्रश्नों का स्पष्ट और सार्वजनिक उत्तर देना चाहिए।

पहला, वर्ष 2002 से अब तक अधिनियम के अंतर्गत कितने कोचिंग संस्थानों का पंजीकरण किया गया और कितने बिना पंजीकरण संचालित पाए गए?

दूसरा, पिछले पांच वर्षों में प्रत्येक जिले में कितने नियमित निरीक्षण किए गए और कितने संस्थानों के विरुद्ध कार्रवाई हुई?

तीसरा, कितने संस्थानों का पंजीकरण निलंबित या निरस्त किया गया तथा कितने मामलों में आर्थिक दंड लगाया गया?

चौथा, कोचिंग संस्थानों के भवनों के स्वीकृत उपयोग और वास्तविक उपयोग का सत्यापन किस विभाग की जिम्मेदारी थी और उसका अनुपालन कैसे सुनिश्चित किया गया?

पांचवां, प्रदेश के कितने कोचिंग संस्थानों के पास लागू नियमों के अनुसार आवश्यक अग्निशमन स्वीकृति और सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध है?

छठा, लखनऊ की घटना से संबंधित भवन और वहां संचालित गतिविधियों के संबंध में पूर्व में कोई निरीक्षण या शिकायत दर्ज हुई थी या नहीं?

सातवां, क्या वर्ष 2024 में केंद्रीय दिशानिर्देश जारी होने के बाद प्रदेश सरकार ने 2002 के अधिनियम की समीक्षा की थी? यदि की थी, तो उसका परिणाम क्या था?

आठवां, प्रस्तावित 50 विद्यार्थियों की सीमा का पुराने अधिनियम की धारा 2 और धारा 3 के साथ क्या कानूनी संबंध होगा?

नौवां, क्या सरकार प्रत्येक जिले में कोचिंग संस्थानों के लिए एकीकृत पंजीकरण, भवन सुरक्षा, अग्नि सुरक्षा और निरीक्षण का डिजिटल रिकॉर्ड बनाएगी?

दसवां, क्या सरकार वर्ष 2002 से अब तक की प्रशासनिक और नियामक विफलताओं की स्वतंत्र समीक्षा कराकर उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक करेगी?

इन प्रश्नों का उत्तर केवल किसी एक विभाग के बयान से नहीं मिलना चाहिए। इसके लिए आधिकारिक दस्तावेज, निरीक्षण रिपोर्ट, पंजीकरण रिकॉर्ड और विभागीय आंकड़े सामने आने चाहिए।

अब जरूरत एक और घोषणा की नहीं, जवाबदेह शासन की है

लखनऊ की अग्निकांड त्रासदी को केवल एक घटना मानकर भूल जाना सबसे बड़ी प्रशासनिक और सामाजिक भूल होगी।

यह घटना एक व्यापक व्यवस्था की समीक्षा का अवसर है। एक ऐसी व्यवस्था जिसमें निजी शिक्षा का कारोबार तेजी से बढ़ा, भवनों का उपयोग बदला, विद्यार्थियों की संख्या बढ़ी, अभिभावकों का आर्थिक निवेश बढ़ा, लेकिन नियामक संस्थाओं की निगरानी और जवाबदेही पर पर्याप्त सार्वजनिक प्रश्न नहीं उठे।

सरकार को यह स्वीकार करना होगा कि किसी भी कानून की वास्तविक शक्ति उसके लागू होने में है। केवल अध्यादेश जारी कर देना, पंजीकरण की सीमा निर्धारित कर देना या जुर्माने की राशि बढ़ा देना अपने आप में समाधान नहीं है।

समाधान तब होगा जब हर जिले में पंजीकरण की व्यवस्था प्रभावी होगी। जब हर भवन का उपयोग उसके स्वीकृत मानकों के अनुरूप होगा। जब अग्नि सुरक्षा की जांच नियमित होगी। जब विद्यार्थियों की संख्या भवन की वास्तविक क्षमता के अनुसार होगी। जब अभिभावकों को फीस और अध्ययन सामग्री की पूरी जानकारी मिलेगी। जब शिक्षक की योग्यता और संस्थान की शैक्षणिक गुणवत्ता की जांच होगी। और जब किसी भी स्तर पर लापरवाही होने पर जिम्मेदार व्यक्ति की जवाबदेही तय होगी।

सबसे जरूरी यह है कि सरकार अपने अधिकारियों के कामकाज की भी समीक्षा करे। कोई भी विभाग केवल इसलिए जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता कि उसकी भूमिका किसी दूसरे विभाग से अलग थी। सार्वजनिक सुरक्षा के मामलों में प्रशासनिक समन्वय और जवाबदेही दोनों आवश्यक हैं।

सरकारों के बदलने से प्रशासनिक व्यवस्था की जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती। वर्ष 2002 में जो कानून बनाया गया था, उसे लागू करना उस समय की सरकारों और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों की जिम्मेदारी थी। बाद में आने वाली सरकारों की भी जिम्मेदारी थी कि वे कानून की समीक्षा करें, कमियों को दूर करें और बदलती परिस्थितियों के अनुरूप उसे प्रभावी बनाएं।

इसलिए आज की सरकार के सामने भी दोहरी जिम्मेदारी है। पहली, वर्तमान स्थिति को तत्काल सुरक्षित और नियंत्रित करना। दूसरी, पिछले 24 वर्षों में कानून के क्रियान्वयन की स्थिति का सार्वजनिक हिसाब देना।

किसी नए अध्यादेश का मूल्यांकन उसकी धाराओं की संख्या, जुर्माने की राशि या सरकारी घोषणाओं से नहीं होगा। उसका मूल्यांकन इस बात से होगा कि क्या वह वास्तव में विद्यार्थियों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है और क्या उसके क्रियान्वयन के लिए प्रशासनिक व्यवस्था को जवाबदेह बनाता है।

अंततः यह केवल कोचिंग संस्थानों के नियमन का प्रश्न नहीं है। यह उस विश्वास का प्रश्न है जो नागरिक अपने शासन और प्रशासन पर करते हैं। जब कोई अभिभावक अपने बच्चे को किसी शैक्षणिक संस्थान में भेजता है, तो वह यह अपेक्षा करता है कि सरकार ने वहां न्यूनतम सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अपनी जिम्मेदारी निभाई होगी।

वह यह नहीं सोचता कि पंजीकरण किस धारा के अंतर्गत होना था, अग्निशमन एनओसी किस कार्यालय से मिलनी थी या भवन के उपयोग की अनुमति किस विभाग ने दी थी। उसके लिए इतना पर्याप्त होना चाहिए कि जिस स्थान पर उसका बच्चा पढ़ने जा रहा है, वह सुरक्षित है।

यही भरोसा शासन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।

उत्तर प्रदेश को आज केवल नया कोचिंग विनियमन अध्यादेश नहीं चाहिए। उसे वर्ष 2002 से अब तक के कानून के क्रियान्वयन का हिसाब चाहिए। उसे यह जानने का अधिकार है कि 24 वर्षों तक निरीक्षण और निगरानी की जिम्मेदारी किसकी थी, नियमों के उल्लंघन को किसने होने दिया, शिकायतों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई और प्रशासनिक विफलताओं के लिए जवाबदेही किसकी तय हुई।

किसी विद्यार्थी की मौत को केवल दुर्घटना बताकर फाइल बंद कर देना आसान है। लेकिन उस दुर्घटना तक पहुंचने वाली परिस्थितियों, अनदेखी, संभावित लापरवाही और संस्थागत विफलताओं की जांच करना ही वास्तविक न्याय और सुशासन की कसौटी है।

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