सुप्रीम कोर्ट के आदेश की 15 महीने तक अनदेखी, BMC कमिश्नर को अवमानना नोटिस; दोषी पाए जाने पर हो सकती है छह महीने की जेल
मुंबई में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का समय पर पालन नहीं करना बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) की कमिश्नर अश्विनी भिड़े के लिए मुश्किलें बढ़ा गया है। शीर्ष अदालत ने उन्हें अवमानना का कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए पूछा है कि अदालत के निर्देशों की कथित जानबूझकर अवहेलना के लिए उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों न की जाए। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कमिश्नर और उनके निजी स्टाफ का वेतन 1 दिसंबर 2026 तक रोकने का निर्देश दिया है। साथ ही BMC पर पांच लाख रुपये की लागत भी लगाई है।
क्या है पूरा मामला?
यह विवाद मुंबई के बोरीवली इलाके में BEST बस स्टैंड के लिए निर्धारित करीब 3,400 वर्ग मीटर जमीन से जुड़ा है। इस जमीन को लेकर BMC और एक निजी डेवलपर के बीच लंबे समय से कानूनी विवाद चल रहा था। 13 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने डेवलपर को जमीन का खाली और शांतिपूर्ण कब्जा नगर निगम को सौंपने का निर्देश दिया था। अदालत ने BMC से तीन महीने के भीतर बस स्टैंड को चालू करने और जमीन से अतिक्रमण हटाने के लिए आवश्यक कदम उठाने को भी कहा था।
13 नवंबर 2025 को मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अतिक्रमण नहीं हटाए जाने पर नाराजगी जताई थी। अदालत ने कमिश्नर से व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर जमीन पर मौजूद लोगों, उन्हें जारी किए गए नोटिस और उनके कब्जे या स्वामित्व के दावों से जुड़े दस्तावेजों की जानकारी मांगी थी।
इसके बाद 28 जुलाई 2026 को अदालत ने फिर निर्देश दिया कि यदि किसी सक्षम अदालत की ओर से रोक नहीं लगाई गई है, तो BMC अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई को आगे बढ़ाए और तीन महीने के भीतर अनुपालन रिपोर्ट पेश करे। इसके बावजूद कार्रवाई पूरी नहीं हुई। 3 नवंबर 2026 को सुनवाई के दौरान BMC ने काम पूरा करने के लिए 30 दिन का अतिरिक्त समय मांगा, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह मांग खारिज कर दी।
अदालत ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान पीठ ने नगर निगम के अधिकारियों के रवैये पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने मौखिक टिप्पणी में अधिकारियों और अतिक्रमणकारियों के बीच मिलीभगत की आशंका भी जताई। BMC की ओर से दलील दी गई कि अतिक्रमणकारियों ने सिविल कोर्ट में कार्यवाही शुरू कर रखी है और दस्तावेज मराठी में होने के कारण उनका अंग्रेजी अनुवाद कराने में समय लग रहा है। इस पर अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया और कहा कि पहले सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन किया जाए।
पीठ ने अश्विनी भिड़े को कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अदालत ने नवंबर महीने का वेतन रोकने के साथ उनके निजी स्टाफ के वेतन पर भी रोक लगाने का निर्देश दिया। BMC पर पांच लाख रुपये की लागत लगाई गई है। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि अवमानना नोटिस जारी होना दोष सिद्ध होने के समान नहीं है। कमिश्नर को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलेगा और आगे का फैसला अदालत करेगी।
अवमानना साबित होने पर कितनी सजा हो सकती है?
भारत में न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 12 के तहत दोषी पाए जाने पर अधिकतम छह महीने की साधारण कैद या दो हजार रुपये तक का जुर्माना अथवा दोनों सजाएं दी जा सकती हैं। कानून में यह भी प्रावधान है कि यदि आरोपी संतोषजनक माफी मांगता है तो अदालत उसे स्वीकार कर सकती है और सजा माफ या कम कर सकती है। हालांकि, माफी स्वीकार करना पूरी तरह अदालत के विवेक पर निर्भर करता है।
संविधान का अनुच्छेद 129 सुप्रीम कोर्ट को अभिलेख न्यायालय का दर्जा देता है और उसे अपनी अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति प्रदान करता है। इस मामले में अदालत को यह देखना होगा कि आदेश का पालन न करना जानबूझकर किया गया था या इसके पीछे कोई उचित कानूनी अथवा व्यावहारिक कारण था। फिलहाल अश्विनी भिड़े के खिलाफ अंतिम दोषसिद्धि या जेल की सजा का आदेश नहीं आया है।
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