अरुणाचल में सियांग बांध पर टकराव: आंदोलनकारी काटोन मोयोंग ने ठुकराया सरकार का न्योता, बोले- अब बातचीत का समय निकल चुका
अरुणाचल प्रदेश में प्रस्तावित 11,200 मेगावाट की सियांग अपर मल्टीपरपज परियोजना (SUMP) को लेकर राज्य सरकार और आदि समुदाय के बीच विवाद गहराता जा रहा है। बांध विरोधी आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल पर्यावरण इंजीनियर और सामाजिक कार्यकर्ता काटोन मोयोंग ने सरकार की बातचीत की पेशकश ठुकरा दी है। गुरुवार को ईटानगर में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने कहा कि सियांग बांध पर चर्चा का समय अब निकल चुका है। उन्होंने मुख्यमंत्री पेमा खांडू से बातचीत के लिए बार-बार निमंत्रण भेजना बंद करने की अपील की।
मोयोंग, जिन्हें 'अबोर मैन' के नाम से भी जाना जाता है, ने कहा कि आदि समुदाय पिछले 47 वर्षों से सियांग नदी पर बांध बनाने का विरोध कर रहा है। उनका कहना है कि समुदाय की मांग स्पष्ट है- सियांग नदी की मुख्य धारा पर बांध नहीं बनाया जाना चाहिए। उन्होंने छोटी नदियों पर जलविद्युत परियोजनाओं का विरोध नहीं करने की बात कही, लेकिन सियांग पर प्रस्तावित विशाल बांध को स्वीकार करने से इनकार किया। उन्होंने परियोजना के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा का तर्क दिए जाने पर भी सवाल उठाए।
**क्या है सरकार का पक्ष?**
मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने हाल ही में खुले पत्र के जरिए प्रदर्शनकारियों से संवाद की अपील की थी। उन्होंने आश्वासन दिया था कि स्थानीय लोगों की चिंताओं, जमीन, घरों और नदी से जुड़े मुद्दों पर पारदर्शिता के साथ चर्चा की जाएगी। मुख्यमंत्री के मुताबिक, फिलहाल सरकार बांध निर्माण का निर्णय नहीं ले रही है, बल्कि परियोजना की पूर्व-व्यवहार्यता रिपोर्ट तैयार करने और संभावित विकल्पों का वैज्ञानिक एवं तकनीकी अध्ययन करने की प्रक्रिया चल रही है।
सरकार का तर्क है कि चीन तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी पर विशाल बांध बना रहा है। यह नदी भारत में प्रवेश करने के बाद सियांग कहलाती है। ऐसे में ऊपरी क्षेत्र में चीन की जलविद्युत परियोजना से संभावित जल प्रवाह और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों को देखते हुए भारत के लिए नदी के जल प्रबंधन और तैयारी का अध्ययन जरूरी है।
**आदि समुदाय क्यों कर रहा विरोध?**
आंदोलनकारी संगठनों और स्थानीय लोगों को आशंका है कि प्रस्तावित परियोजना से कई गांव जलमग्न हो सकते हैं। इससे लोगों को अपने पुश्तैनी घरों और जमीनों से विस्थापित होना पड़ सकता है। इसके अलावा जंगल, खेती की जमीन, जैव विविधता और आदि समुदाय की पारंपरिक संस्कृति पर असर पड़ने की चिंता भी जताई जा रही है। प्रदर्शनकारी परियोजना से जुड़ी पूर्व-व्यवहार्यता रिपोर्ट के सर्वेक्षण कार्य को रोकने और प्रभावित क्षेत्रों में तैनात सुरक्षा बलों को वापस बुलाने की मांग कर रहे हैं।
विरोध प्रदर्शन के दौरान हाल के दिनों में तनाव और हिंसा की घटनाएं भी सामने आई हैं। अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पों के बाद सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ाई गई थी। दिल्ली में भी परियोजना के विरोध में प्रदर्शन के दौरान काटोन मोयोंग समेत कई लोगों को हिरासत में लिया गया था।
फिलहाल सरकार संवाद के जरिए समाधान निकालने की बात कह रही है, जबकि आंदोलनकारी परियोजना को लेकर अपनी आपत्ति पर कायम हैं। ऐसे में सियांग घाटी में प्रस्तावित परियोजना को लेकर सरकार और स्थानीय समुदाय के बीच गतिरोध बना हुआ है।
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