कलियुग में श्रीकृष्ण की पटरानी मां यमुना के साथ कब तक होता रहेगा छल? आस्था के नाम पर लाखों श्रद्धालुओं को बुलाने की तैयारी, दूसरी ओर यमुना के घाटों की सिल्ट यमुना में ही डाली जा रही; रात के अंधेरे में सफाई के नाम पर प्रदूषण को दे रहे न्योता
गोपाल चतुर्वेदी
मथुरा। धर्मनगरी मथुरा में आस्था का सबसे बड़ा केंद्र मां यमुना हैं। भगवान श्रीकृष्ण की पटरानी और ब्रज की जीवनरेखा कही जाने वाली पतित पावनी यमुना का यमुनोत्री के बाद सबसे बड़ा तीर्थस्थल मथुरा है। कार्तिक शुक्ल द्वितीया यानी यम द्वितीया पर यहां लाखों श्रद्धालु यमुना स्नान के लिए पहुंचने वाले हैं। लेकिन सवाल यह है कि जिन मां यमुना के दर्शन और आचमन के लिए श्रद्धालुओं को आमंत्रित किया जा रहा है, उन्हीं के आंचल में आखिर कैसा पानी परोसा जा रहा है?
एक ओर नगर निगम घाटों की सफाई और व्यवस्थाओं के दावे कर रहा है, वहीं दूसरी ओर आरोप है कि रात के अंधेरे में घाटों पर जमा सिल्ट निकालकर सुरक्षित निस्तारण करने के बजाय उसे वापस यमुना के पानी में ही डाला जा रहा है। यदि यह सच है तो यह सफाई नहीं, बल्कि प्रदूषण को एक स्थान से उठाकर दूसरे स्थान पर फैलाने की कवायद है। सवाल उठता है कि आखिर किसके आदेश पर और किसकी निगरानी में यह काम हो रहा है?
विडंबना देखिए, मां यमुना के नाम पर आयोजन, प्रचार, राजनीति और भाषणों की कोई कमी नहीं है, लेकिन यमुना की वास्तविक दुर्दशा पर जिम्मेदारों की आवाज अक्सर खामोश हो जाती है। हाल ही में देश के प्रमुख समाचार पत्रों में यमुना जल की गुणवत्ता को लेकर प्रकाशित रिपोर्टों ने भी चिंता बढ़ाई है। ऐसे में श्रद्धालुओं के मन में यमुना स्नान और आचमन को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। आस्था के साथ स्वास्थ्य का सवाल भी जुड़ा है, लेकिन जिम्मेदार व्यवस्था को इसकी कितनी चिंता है?
नगर निगम प्रशासन को बताना चाहिए कि घाटों से निकाली जा रही सिल्ट का वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण क्यों नहीं किया जा रहा? क्या यमुना में वापस डाली जा रही सिल्ट की गुणवत्ता की जांच हुई है? क्या इस कार्य की कोई निगरानी व्यवस्था है? यदि सब कुछ नियमों के अनुसार हो रहा है तो प्रशासन को सामने आकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल उन लोगों से भी है, जो मां यमुना के नाम पर राजनीतिक और धार्मिक मंचों से अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। यमुना शुद्धिकरण के संकल्प, बड़े-बड़े मंच, फोटो और बयान तो खूब दिखाई देते हैं, लेकिन जब यमुना की दुर्दशा पर आवाज उठाने का समय आता है तो यही मठाधीश और स्वयंभू यमुना भक्त मौन क्यों हो जाते हैं? क्या मां यमुना की चिंता केवल आयोजनों और भाषणों तक सीमित रह गई है?
कार्तिक में लाखों श्रद्धालु मथुरा आकर मां यमुना से पुण्य और मोक्ष की कामना करेंगे। उन्हें क्या जवाब दिया जाएगा कि जिस जल को वे श्रद्धा से माथे पर लगाएंगे, उसकी स्वच्छता के लिए जिम्मेदार संस्थाओं ने क्या किया? क्या श्रद्धालुओं की आस्था को केवल स्नान पर्व की भीड़ और व्यवस्थाओं के आंकड़ों तक सीमित कर दिया गया है?
मां यमुना कोई राजनीतिक पोस्टर, सरकारी विज्ञापन या मौसमी आयोजन का मंच नहीं हैं। वह ब्रज की पहचान, करोड़ों लोगों की आस्था और प्रकृति की अमूल्य धरोहर हैं। अब वक्त आ गया है कि सफाई के नाम पर दिखावे की जगह जवाबदेही तय हो। आखिर कलियुग में श्रीकृष्ण की पटरानी मां यमुना के साथ यह छल कब तक चलता रहेगा?
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