सुप्रीम कोर्ट: ‘हिरासत में नहीं लिया’, ममता बनर्जी को प्रदर्शन स्थल से हटाने पर दिल्ली पुलिस का दावा; याचिका खारिज करने की मांग
नई दिल्ली। दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में दावा किया है कि 10 अक्तूबर को दिल्ली में हुए प्रदर्शन के दौरान पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी समेत तृणमूल कांग्रेस के किसी भी नेता को गिरफ्तार या हिरासत में नहीं लिया गया था। पुलिस के मुताबिक, निषेधाज्ञा का उल्लंघन करने पर नेताओं को प्रदर्शन स्थल से हटाकर द्वारका नॉर्थ पुलिस थाने ले जाया गया था और परिस्थितियां सामान्य होने के बाद उन्हें जाने की अनुमति दे दी गई थी।
संयुक्त पुलिस आयुक्त सुरेंद्र कुमार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जवाबी हलफनामे में कहा गया है कि प्रदर्शन के दौरान ममता बनर्जी, डेरेक ओ'ब्रायन, डोला सेन, प्रतिमा मंडल और अन्य नेताओं ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत जारी प्रतिबंधात्मक आदेशों का उल्लंघन किया था। पुलिस का दावा है कि अधिकारियों ने नेताओं को इन प्रतिबंधों की जानकारी दी, लेकिन निर्देशों का पालन नहीं किए जाने पर दोपहर करीब दो बजे उन्हें साउथ एवेन्यू से हटाकर थाने ले जाया गया।
हलफनामे के अनुसार, ममता बनर्जी, डोला सेन और प्रतिमा मंडल को शाम 5:50 बजे जाने के लिए स्वतंत्र बताया गया था। वहीं, डेरेक ओ'ब्रायन और उनके साथ मौजूद अन्य नेताओं को शाम 6:05 बजे जाने की अनुमति दी गई। पुलिस का कहना है कि सभी नेता बाद में अपनी-अपनी गाड़ियों से रवाना हो गए। इस दौरान उन्हें चाय, कॉफी और भोजन भी उपलब्ध कराया गया था।
यह मामला तृणमूल कांग्रेस की सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से जुड़ा है। बंदी प्रत्यक्षीकरण यानी हैबियस कॉर्पस एक संवैधानिक उपाय है, जिसके जरिए किसी व्यक्ति को कथित गैरकानूनी हिरासत से मुक्त कराने के लिए अदालत से हस्तक्षेप की मांग की जाती है।
दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट से याचिका खारिज करने का अनुरोध करते हुए कहा है कि जब किसी नेता को गिरफ्तार या हिरासत में नहीं लिया गया और सभी को जाने की अनुमति दे दी गई, तो याचिका का उद्देश्य पूरा हो चुका है। पुलिस ने इसे निष्प्रभावी बताते हुए कहा कि अब इस पर सुनवाई की आवश्यकता नहीं रह गई है।
हालांकि, याचिका खारिज होगी या नहीं, इसका अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट को करना है। फिलहाल पुलिस ने अपना पक्ष रखा है; अदालत का निर्णय आने तक याचिका के भविष्य को लेकर कोई निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
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