केदारताल हादसे के बाद ट्रैकिंग नियमों में फिर बदलाव की तैयारी, दो साल पहले बनी SOP के पालन पर उठे सवाल
उत्तरकाशी। केदारताल ट्रैक पर हुए हिमस्खलन हादसे के बाद उत्तरकाशी जिला प्रशासन ने ट्रैकिंग और पर्वतारोहण से जुड़े सुरक्षा नियमों को और सख्त करने की तैयारी शुरू कर दी है। खास बात यह है कि वर्ष 2024 में सहस्त्रताल ट्रैक पर हुए हादसे के बाद भी जिला प्रशासन ने विस्तृत मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार की थी। इसके बावजूद लगातार हो रही दुर्घटनाओं ने नियमों के पालन और निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
वर्ष 2024 में सहस्त्रताल ट्रैक पर कर्नाटक के 22 सदस्यीय दल के नौ सदस्यों की बर्फीले तूफान और प्रतिकूल मौसम के कारण मौत हो गई थी। इस घटना के बाद तत्कालीन जिलाधिकारी ने समिति गठित कर ट्रैकिंग और पर्वतारोहण के लिए SOP तैयार कराई थी। इसमें उच्च हिमालयी क्षेत्रों में सैटेलाइट फोन की अनिवार्यता, गाइड के लिए प्रशिक्षण प्रमाणपत्र और अनुभव, ट्रैकर्स की संख्या के अनुसार गाइड व पोर्टर की तैनाती तथा कुक और पोर्टरों को मेडिकल प्रशिक्षण देने जैसे प्रावधान शामिल किए गए थे।
अब केदारताल हादसे के बाद प्रशासन इस SOP में नए सुरक्षा मानक जोड़ने और पुराने नियमों को अधिक प्रभावी बनाने पर विचार कर रहा है। जिलाधिकारी प्रशांत आर्य के अनुसार, मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा की जाएगी और आपात स्थिति में बचाव अभियान चलाने के लिए उपलब्ध संसाधनों को भी मजबूत किया जाएगा। खराब मौसम की स्थिति में ट्रैकिंग रोकने और बचाव दल की क्षमता बढ़ाने जैसे पहलुओं पर भी ध्यान दिया जा रहा है।
प्रशासनिक आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2021 से अब तक उत्तरकाशी जिले के विभिन्न ट्रैकिंग मार्गों और पर्वतारोहण अभियानों के दौरान 53 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। इनमें वर्ष 2022 में द्रौपदी का डांडा-2 में हिमस्खलन से मारे गए नेहरू पर्वतारोहण संस्थान के 29 प्रशिक्षु और प्रशिक्षक तथा वर्ष 2024 में सहस्त्रताल हादसे में जान गंवाने वाले नौ ट्रैकर शामिल हैं।
लगातार हो रहे हादसों के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सुरक्षा नियम पहले से मौजूद हैं, तो उनका सख्ती से पालन क्यों नहीं हो पा रहा है। अब प्रशासन के सामने केवल SOP में बदलाव करना ही नहीं, बल्कि ट्रैकिंग एजेंसियों, गाइडों और संबंधित विभागों की जवाबदेही तय करना भी चुनौती है।
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