मथुरा-वृंदावन में अवैध कॉलोनियों और निर्माणों का बढ़ता जाल, करोड़ों के सौंदर्यीकरण पर सवाल; सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन कराने में प्रशासन क्यों पीछे?

आवासीय क्षेत्रों में व्यावसायिक गतिविधियां, कृषि भूमि पर अवैध प्लॉटिंग और स्वीकृत कॉलोनियों में बिना नक्शे के निर्माण जारी; दिल्ली में कार्रवाई हो सकती है तो उत्तर प्रदेश में क्यों नहीं? एमवीडीए की कार्यप्रणाली और अधिकारियों की जवाबदेही पर उठे सवाल।

Thursday, November 5, 2026 - 05:17
Updated: 10 hours ago
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मथुरा-वृंदावन में अवैध कॉलोनियों और निर्माणों का बढ़ता जाल, करोड़ों के सौंदर्यीकरण पर सवाल; सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन कराने में प्रशासन क्यों पीछे?

मथुरा। भगवान श्रीकृष्ण की नगरी मथुरा-वृंदावन को विश्वस्तरीय धार्मिक पर्यटन स्थल बनाने के लिए सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर रही है। सड़कों, चौराहों, प्रवेश मार्गों और अन्य सुविधाओं के सौंदर्यीकरण पर लगातार काम हो रहा है। लेकिन दूसरी ओर शहर में अनधिकृत कॉलोनियों का विस्तार, अवैध प्लॉटिंग, आवासीय क्षेत्रों में व्यावसायिक गतिविधियां और बिना स्वीकृत नक्शे के निर्माण शहर की विकास व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सरकार शहर को सुंदर और व्यवस्थित बनाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, तो उसी शहर की सुंदरता और नियोजित विकास को नुकसान पहुंचाने वाले अवैध निर्माणों पर प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? क्या सौंदर्यीकरण केवल सड़क और चौराहों तक सीमित है, या शहर को नियमों के अनुसार विकसित करना भी प्रशासन की जिम्मेदारी है?

आवासीय क्षेत्रों में व्यावसायिक गतिविधियां, दिल्ली में कार्रवाई तो मथुरा में क्यों नहीं?

आवासीय क्षेत्रों में व्यावसायिक गतिविधियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों और स्थानीय विकास नियमों में महत्वपूर्ण प्रावधान हैं। जहां मास्टर प्लान और लागू नियम व्यावसायिक गतिविधियों की अनुमति नहीं देते, वहां ऐसी गतिविधियों को रोकना संबंधित प्राधिकरण की जिम्मेदारी है।

दिल्ली में आवासीय क्षेत्रों में नियमों के विरुद्ध चल रही व्यावसायिक गतिविधियों पर कार्रवाई के उदाहरण सामने आते रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि जब दिल्ली और उत्तर प्रदेश दोनों जगह भाजपा की सरकार है, तो मथुरा-वृंदावन में नियमों का पालन कराने के लिए वैसी सख्ती क्यों नहीं दिखाई देती? यदि दिल्ली में नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई हो सकती है, तो उत्तर प्रदेश में भी क्यों नहीं?

मथुरा-वृंदावन के आवासीय क्षेत्रों में संचालित होटल, गेस्ट हाउस, कार्यालय और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की जांच होनी चाहिए। जहां भूमि उपयोग और नियमों के अनुसार अनुमति नहीं है, वहां कार्रवाई की जानी चाहिए। आखिर स्थानीय निवासियों को यातायात जाम, पार्किंग, शोर और अन्य परेशानियों से कब राहत मिलेगी?

अनधिकृत कॉलोनियों का कारोबार, आम आदमी की मेहनत की कमाई दांव पर

मथुरा-वृंदावन और आसपास के क्षेत्रों में कृषि भूमि पर प्लॉटिंग कर अनधिकृत कॉलोनियां विकसित किए जाने की शिकायतें लगातार चिंता बढ़ा रही हैं। आरोप हैं कि कुछ कॉलोनाइजर बिना स्वीकृत लेआउट और आवश्यक अनुमतियों के भूखंड बेचकर लोगों को सुविधाओं के बड़े-बड़े सपने दिखाते हैं। बाद में खरीदारों को पता चलता है कि कॉलोनी का लेआउट स्वीकृत नहीं है या भूमि का उपयोग आवासीय निर्माण के लिए अनुमत नहीं है।

विभिन्न प्रकाशित रिपोर्टों में मथुरा क्षेत्र की 63 अनधिकृत कॉलोनियों का उल्लेख किया गया है। वहीं गोवर्धन रोड क्षेत्र में करीब 35 हजार वर्ग मीटर में विकसित बताई गई एक अनधिकृत कॉलोनी में 12 कॉटेज, कार्यालय और वॉच टावर सहित निर्माणों पर कार्रवाई की खबरें भी सामने आई थीं।

सवाल यह है कि इतनी बड़ी जमीन पर प्लॉटिंग और निर्माण होने तक संबंधित विभागों की निगरानी कहां थी? क्या अधिकारियों को इसकी जानकारी नहीं मिली या शिकायतों के बाद ही कार्रवाई शुरू होती है? केवल निर्माण सील करना पर्याप्त नहीं है। अवैध कॉलोनी विकसित करने वालों, प्लॉट बेचने वालों और पूरे कारोबार की भी जांच होनी चाहिए।

इसका सबसे बड़ा नुकसान आम लोगों को होता है, जो जीवनभर की जमा पूंजी लगाकर प्लॉट खरीदते हैं और बाद में कानूनी विवादों में फंस जाते हैं। प्राधिकरण की जिम्मेदारी है कि ऐसी कॉलोनियों की सूची सार्वजनिक करे और लोगों को पहले से सचेत करे।

स्वीकृत कॉलोनियों में बिना नक्शे के निर्माण पर कठोर कार्रवाई क्यों नहीं?

एक गंभीर सवाल उन कॉलोनियों को लेकर भी है जिन्हें मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण ने स्वयं स्वीकृति दी है। जब कॉलोनी का लेआउट स्वीकृत है, तो वहां भवन निर्माण भी स्वीकृत मानचित्र और निर्धारित भवन उपनियमों के अनुसार होना चाहिए। इसके बावजूद यदि बिना नक्शा पास कराए मकान, अतिरिक्त मंजिलें, दुकानें या व्यावसायिक भवन बनाए जा रहे हैं, तो प्राधिकरण की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

आखिर निर्माण शुरू होने से पहले निरीक्षण क्यों नहीं होता? स्वीकृत नक्शे से अलग निर्माण होने पर तत्काल कार्रवाई क्यों नहीं की जाती? क्या प्राधिकरण केवल नोटिस जारी करने तक सीमित रह गया है? विभाग को स्पष्ट करना चाहिए कि ऐसी कॉलोनियों में बिना नक्शे के कितने निर्माण चिह्नित किए गए और कितनों के खिलाफ वास्तव में सीलिंग या ध्वस्तीकरण की कार्रवाई हुई।

एनजीटी के मामले और अधिकारियों की जवाबदेही

एनजीटी की निगरानी से जुड़े पुराने आंकड़ों में 249 अवैध निर्माणों की पहचान, 209 मामलों में ध्वस्तीकरण आदेश, 118 निर्माणों के ध्वस्तीकरण और 91 मामलों के शेष रहने का उल्लेख किया गया था। इन आंकड़ों की वर्तमान स्थिति की आधिकारिक पुष्टि जरूरी है, लेकिन यह सवाल आज भी प्रासंगिक है कि जिन मामलों में कार्रवाई के आदेश जारी हुए, उनमें शेष कार्रवाई पूरी क्यों नहीं हुई?

अवैध निर्माणों को लेकर भू-माफियाओं और प्रभावशाली लोगों की भूमिका पर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। इन आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यदि किसी अधिकारी की लापरवाही या मिलीभगत प्रमाणित होती है, तो उसके खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए। कानून केवल सामान्य नागरिकों पर लागू नहीं होना चाहिए; बड़े बिल्डरों और प्रभावशाली लोगों के निर्माणों पर भी समान रूप से कार्रवाई होनी चाहिए।

एमवीडीए और जिला प्रशासन से सीधे सवाल

मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण और जिला प्रशासन को बताना चाहिए कि शहर में कितनी अनधिकृत कॉलोनियां हैं, आवासीय क्षेत्रों में नियमों के विरुद्ध कितने व्यावसायिक प्रतिष्ठान चल रहे हैं और स्वीकृत कॉलोनियों में बिना नक्शे के निर्माण करने वालों पर अब तक क्या कार्रवाई हुई है? कितने अवैध निर्माणों को नोटिस दिया गया, कितनों को सील किया गया और कितनों को ध्वस्त किया गया? सौंदर्यीकरण और नियोजित विकास को नुकसान पहुंचाने वाले निर्माणों के खिलाफ अब तक कितनी प्रभावी कानूनी कार्रवाई हुई है?

मथुरा-वृंदावन केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि लाखों लोगों का घर भी है। यहां विकास के नाम पर नियमों की अनदेखी और आम लोगों की मेहनत की कमाई को जोखिम में नहीं डाला जा सकता। सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर शहर को सुंदर बनाने का प्रयास कर रही है, लेकिन जब तक अनधिकृत कॉलोनियों, अवैध प्लॉटिंग, आवासीय क्षेत्रों में नियमों के विरुद्ध व्यावसायिक गतिविधियों और बिना नक्शे के निर्माण पर रोक नहीं लगेगी, तब तक यह सौंदर्यीकरण अधूरा ही रहेगा।

जनता का सवाल सीधा है—जब दिल्ली में नियमों का पालन कराया जा सकता है, तो मथुरा-वृंदावन में क्यों नहीं? आखिर एमवीडीए कब अपनी जिम्मेदारी निभाएगा और शहर में कानून का पालन सभी के लिए समान रूप से कब सुनिश्चित होगा?

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