यूपी में झूठे रेप-छेड़छाड़ के मुकदमों के नाम पर वसूली का आरोप, कुशीनगर की महिला के स्टिंग से सामने आया कथित नेटवर्क
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में दुष्कर्म और छेड़छाड़ के मामलों में झूठे मुकदमे दर्ज कराने के नाम पर लोगों से पैसे और संपत्ति वसूलने के आरोपों को लेकर एक इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट सामने आई है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कुछ महिलाएं कथित तौर पर दूसरे लोगों को गंभीर आपराधिक मामलों में फंसाने की धमकी देकर समझौते के नाम पर रकम वसूलती हैं। इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की ओर से झूठे मुकदमों के दुरुपयोग पर की गई सख्त टिप्पणियां भी चर्चा में हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, कुशीनगर के रामकोला क्षेत्र की करीब 45 वर्षीय जरीना खातून ने एक स्टिंग के दौरान दावा किया कि वह पैसे लेकर किसी के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज कराने में मदद कर सकती हैं। बातचीत में उन्होंने पुलिसकर्मियों से अच्छे संबंध होने और थाने में अपनी पहुंच होने की बात कही। उन्होंने यह भी दावा किया कि जरूरत पड़ने पर नाबालिग लड़कियों के माध्यम से पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज कराया जा सकता है। हालांकि, स्टिंग में किए गए इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित मामलों में उनकी भूमिका की आधिकारिक जांच का विवरण सामने आना जरूरी है।
रिपोर्ट में कुछ ऐसे लोगों के बयान भी शामिल किए गए हैं, जिन्होंने जरीना पर जमीन के विवाद और आपसी रंजिश के चलते छेड़छाड़ या दुष्कर्म के प्रयास के मामले दर्ज कराने का आरोप लगाया। उनका दावा है कि मुकदमे दर्ज होने के बाद उन पर समझौते के लिए दबाव बनाया गया और रकम या जमीन देने के बाद विवाद खत्म हुआ। एक अन्य मामले में एक महिला पर अलग-अलग जिलों में कई लोगों के खिलाफ शिकायतें दर्ज कराने और बाद में समझौता करने के आरोप लगाए गए हैं। ये आरोप संबंधित पक्षों के बयानों और रिपोर्ट में किए गए दावों पर आधारित हैं।
रिपोर्ट में यह भी सवाल उठाया गया है कि यदि कोई व्यक्ति झूठे मुकदमे दर्ज कराने के नाम पर वसूली का नेटवर्क चला रहा है, तो ऐसे मामलों में पुलिस और प्रशासन की भूमिका की निष्पक्ष जांच क्यों नहीं होनी चाहिए। साथ ही, किसी महिला की शिकायत को केवल आरोप के आधार पर झूठा मानना भी उचित नहीं है। प्रत्येक मामले में उपलब्ध साक्ष्यों, जांच और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए।
इलाहाबाद हाईकोर्ट पहले भी झूठे दुष्कर्म मुकदमों के दुरुपयोग पर चिंता जता चुका है। फरवरी 2024 में एक मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा था कि यदि जांच और सुनवाई में शिकायत झूठी साबित होती है, तो शिकायतकर्ता और संबंधित गवाहों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई पर विचार किया जाना चाहिए। अदालत ने ऐसे मामलों में जांच और न्यायिक प्रक्रिया में लगने वाले समय तथा संसाधनों की बर्बादी पर भी टिप्पणी की थी। वहीं, जनवरी 2023 में हाईकोर्ट ने कथित तौर पर झूठे मुकदमों के जरिए वसूली करने वाले समूह से जुड़ी पांच महिलाओं की याचिका पर राहत देने से इनकार करते हुए मामले की विस्तृत जांच की आवश्यकता बताई थी।
कानून का उद्देश्य यौन अपराधों के पीड़ितों को न्याय और सुरक्षा देना है। ऐसे कानूनों के कथित दुरुपयोग के मामलों में भी निष्पक्ष जांच जरूरी है, ताकि वास्तविक पीड़ितों को न्याय मिलने में बाधा न आए और किसी निर्दोष व्यक्ति को झूठे आरोपों के कारण नुकसान न उठाना पड़े।
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