पत्रकारों के विरुद्ध अपराधों पर दण्डमुक्ति समाप्त करने का अंतरराष्ट्रीय दिवस: सच की कीमत आखिर कितनी जानों से चुकानी होगी?
अरुण कुमार
हर साल 2 नवंबर को ‘पत्रकारों के विरुद्ध अपराधों पर दण्डमुक्ति समाप्त करने का अंतरराष्ट्रीय दिवस’ मनाया जाता है। यह दिन उन पत्रकारों को याद करने और उनके प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करने का संकल्प लेने का अवसर है, जिन्होंने सच को सामने लाने और आम लोगों तक वास्तविक जानकारी पहुंचाने के लिए अपनी जान गंवाई। पत्रकारों की सुरक्षा केवल मीडिया जगत का मुद्दा नहीं, बल्कि लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिकों के सूचना पाने के अधिकार से जुड़ा विषय है।
दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में समाचार संकलन, भ्रष्टाचार का खुलासा, सत्ता से सवाल और जनहित के मुद्दों की पड़ताल करने वाले पत्रकारों को लगातार हिंसा और धमकियों का सामना करना पड़ रहा है। यूनेस्को के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2006 से 2025 के बीच दुनिया भर में 1,600 से अधिक पत्रकारों की हत्या हुई। इनमें से लगभग छह में से पांच मामलों में दोषियों को न्यायिक प्रक्रिया के तहत सजा नहीं मिल सकी। वर्ष 2024 और 2025 में ही 189 पत्रकार हिंसक हमलों में मारे गए, जिनमें से 127 की मौत संघर्ष वाले क्षेत्रों में हुई। ये आंकड़े बताते हैं कि पत्रकारों की सुरक्षा और अपराधियों को जवाबदेह ठहराने की चुनौती कितनी गंभीर है।
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 2013 में प्रस्ताव A/RES/68/163 के माध्यम से 2 नवंबर को यह अंतरराष्ट्रीय दिवस घोषित किया था। इस तारीख का चयन माली में 2 नवंबर 2013 को दो फ्रांसीसी पत्रकारों की हत्या की स्मृति में किया गया। इस दिवस का प्रमुख उद्देश्य पत्रकारों के विरुद्ध होने वाले अपराधों की निष्पक्ष जांच, दोषियों को सजा और पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए सरकारों तथा संस्थाओं को जवाबदेह बनाना है।
पत्रकारों के सामने खतरे केवल हत्या या शारीरिक हमलों तक सीमित नहीं हैं। उन्हें धमकियों, उत्पीड़न, निगरानी, कानूनी दबाव और डिजिटल माध्यमों पर चरित्रहनन जैसी परिस्थितियों का भी सामना करना पड़ता है। विशेष रूप से महिला पत्रकारों को ऑनलाइन अभद्रता, धमकियों और लैंगिक आधार पर निशाना बनाए जाने की घटनाओं से जूझना पड़ता है। यूनेस्को की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 के एक अध्ययन में सर्वेक्षण में शामिल 75 प्रतिशत महिला पत्रकारों ने ऑनलाइन हिंसा का अनुभव होने की बात कही थी। डिजिटल दुनिया में बढ़ते ऐसे हमले पत्रकारों की स्वतंत्रता और सुरक्षा के लिए नई चुनौती बन रहे हैं।
दुनिया के कई देशों ने पत्रकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की सुरक्षा के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएं विकसित की हैं। मैक्सिको और कोलंबिया में जोखिम का सामना कर रहे पत्रकारों के लिए विशेष सुरक्षा कार्यक्रम संचालित किए जाते हैं। वहीं, यूरोपीय संघ में पत्रकारों की सुरक्षा और मीडिया की स्वतंत्रता को मजबूत करने के लिए नीतिगत प्रयास किए गए हैं। इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य पत्रकारों को खतरे की स्थिति में संरक्षण देना और उनके विरुद्ध होने वाले अपराधों पर प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करना है।
भारत में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया, सूचना का अधिकार कानून और कुछ राज्यों की पत्रकार सुरक्षा संबंधी पहल मौजूद हैं। इसके बावजूद पत्रकारों पर हमलों और हत्याओं के मामलों में समयबद्ध जांच, गवाहों की सुरक्षा तथा दोषियों को सजा दिलाने की प्रक्रिया को और प्रभावी बनाने की जरूरत है। पत्रकारों की सुरक्षा के लिए केवल घोषणाएं पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि ऐसी व्यवस्था जरूरी है जिसमें किसी पत्रकार को अपने काम के कारण धमकी मिलने पर तत्काल संरक्षण मिले और अपराध करने वालों के खिलाफ निष्पक्ष कार्रवाई हो।
लोकतंत्र में पत्रकार केवल घटनाओं की जानकारी देने का काम नहीं करते, बल्कि वे सत्ता, प्रशासन और व्यवस्था को जवाबदेह बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जब किसी पत्रकार पर हमला होता है और उसे न्याय नहीं मिलता, तो उसका असर केवल एक व्यक्ति या उसके परिवार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज के सूचना पाने के अधिकार और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भी पड़ता है।
पत्रकारों की सुरक्षा ही लोकतंत्र की सुरक्षा है। पत्रकारों पर होने वाले प्रत्येक हमले की निष्पक्ष जांच, दोषियों के खिलाफ त्वरित कानूनी कार्रवाई और पेशेगत स्वतंत्रता सुनिश्चित करना सरकार तथा संबंधित संस्थाओं की जिम्मेदारी है। सच को सामने लाने वाले लोगों को भयमुक्त वातावरण मिलना चाहिए। आखिर सच उजागर करने की कीमत कितनी जानों से चुकानी होगी? 2 नवंबर का दिन इसी सवाल पर गंभीरता से विचार करने और पत्रकारों की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाने का संकल्प लेने का अवसर है।
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