शांतिपुर की बामा काली की अनोखी परंपरा, 60 साल पुरानी पूजा में आज भी नहीं होती कृत्रिम रोशनी का इस्तेमाल
पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के शांतिपुर की बामा काली अपनी अनूठी पूजा परंपरा और विसर्जन के दौरान होने वाले विशेष नृत्य के लिए प्रसिद्ध हैं। इस पूजा की सबसे खास बात यह है कि यहां देवी की आराधना में कृत्रिम बिजली की रोशनी का इस्तेमाल नहीं किया जाता। परंपरा के अनुसार, मां की पूजा मोमबत्तियों, दीपों और मशालों की रोशनी में की जाती है।
बामा काली की एक बहन के रूप में बोम्बेट काली का भी उल्लेख मिलता है। दोनों देवियों से जुड़ी लोककथाएं शांतिपुर की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा को खास बनाती हैं। मान्यता है कि विसर्जन के दौरान बड़ाबाजार मोड़ पर बामा काली और आसपास की अन्य काली प्रतिमाओं का मिलन हुआ करता था। इसी मिलन को उत्सव के रूप में मनाते हुए देवियों की प्रतिमाओं को ढाक की थाप पर नृत्य कराया जाने लगा। धीरे-धीरे यह परंपरा बामा काली की पहचान बन गई।

आज बामा काली का विसर्जन नृत्य सोशल मीडिया पर भी काफी लोकप्रिय हो चुका है। हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु और दर्शक इस अनोखे आयोजन को देखने शांतिपुर पहुंचते हैं। सोशल मीडिया पर कई जगह इस पूजा को 500 साल पुराना बताया जाता है, हालांकि उपलब्ध स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार बामा काली की वर्तमान पूजा परंपरा की शुरुआत 1969 में घट पूजा से हुई थी और 1970 से प्रतिमा स्थापित कर पूजा शुरू की गई। इस लिहाज से यह परंपरा लगभग 56-57 साल पुरानी है।
इस तरह शांतिपुर की बामा काली पूजा में आस्था, लोककथाओं और सांस्कृतिक विरासत का अनूठा संगम देखने को मिलता है।
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