मेरे आंगने में तुम्हारा क्या काम है! पत्नी पार्षद, बैठक में पतियों की दखलअंदाजी...
गोपाल चतुर्वेदी
मथुरा। भाजपा एक ओर महिला सशक्तिकरण की बात करती है। संसद से लेकर नगर निकायों तक महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने के लिए कानून और आरक्षण की पैरवी करती है, वहीं जमीनी हकीकत कुछ और ही तस्वीर दिखाती नजर आ रही है।
मथुरा-वृंदावन नगर निगम की बोर्ड बैठक के दौरान कुछ महिला पार्षदों के पतियों की मौजूदगी चर्चा का विषय बन गई। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में एक पार्षद पति की उपस्थिति को लेकर सवाल उठ रहे हैं। आखिर जब जनता ने पार्षद के रूप में महिला को चुना है, तो बैठक में उनके पति की भूमिका क्या है?
सवाल सीधा है—पार्षद पत्नी हैं या पति? जनादेश महिला को मिला है तो प्रतिनिधित्व भी महिला ही क्यों न करे?
महिला आरक्षण का उद्देश्य महिलाओं को राजनीतिक निर्णय प्रक्रिया में स्वतंत्र भागीदारी और नेतृत्व का अवसर देना है, न कि उनके नाम पर पतियों का राजनीतिक नियंत्रण कायम रखना।
महिला सशक्तिकरण सिर्फ चुनाव लड़वाने और कुर्सी पर बैठाने से नहीं होगा, उन्हें अपने फैसले खुद लेने और जनता के सवालों का जवाब देने का अवसर भी देना होगा।
आखिर नगर निगम की बोर्ड बैठक है या पार्षद पतियों की पंचायत?
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