सुप्रीम कोर्ट: हाईकोर्ट में मुकदमों के नामकरण और पंजीकरण में एकरूपता की मांग, ई-कमेटी के पास पहुंचेगा मामला
नई दिल्ली। देश के सभी हाईकोर्ट में मुकदमों के नामकरण, पंजीकरण प्रक्रिया और न्यायिक शब्दावली में एकरूपता लाने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को जनहित याचिका पर न्यायिक सुनवाई करने से इनकार कर दिया। हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय को अपनी मांगों के संबंध में सुप्रीम कोर्ट की ई-कमेटी के समक्ष प्रतिवेदन देने की अनुमति दे दी।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा कि मुकदमों के वर्गीकरण और नामकरण को मानकीकृत करने का काम ई-कमेटी की मौजूदा पहल का हिस्सा है। इससे राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG) पर न्यायिक रिकॉर्ड और आंकड़ों को खोजना तथा उनकी पहचान करना आसान होगा।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने बताया कि अलग-अलग हाईकोर्ट में एक ही तरह के मामलों के नाम और पंजीकरण की प्रक्रिया अलग-अलग है। उदाहरण के तौर पर, कुछ अदालतों में रिट याचिका को 'WP' के नाम से दर्ज किया जाता है, जबकि कुछ में 'WPA' का इस्तेमाल होता है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की प्रधान पीठ और लखनऊ पीठ में भी इस तरह के अंतर का मुद्दा उठाया गया। याचिकाकर्ता के अनुसार, इन भिन्नताओं के कारण मुकदमों की पहचान, उनकी निगरानी और न्यायिक रिकॉर्ड खोजने में परेशानी होती है।
न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने कहा कि मुकदमों के एकसमान नामकरण का मुद्दा प्रासंगिक है और ई-कमेटी पहले से ही व्यापक मानकीकरण परियोजना के तहत इस पर काम कर रही है। पीठ ने बताया कि जिला और मजिस्ट्रेट अदालतों में केस इंफॉर्मेशन सिस्टम के माध्यम से मानकीकरण की प्रक्रिया शुरू की जा चुकी है और इसे आगे बढ़ाया जा रहा है।
याचिका में कोर्ट फीस की अलग-अलग दरों का मुद्दा भी उठाया गया था। इस पर पीठ ने कहा कि कोर्ट फीस तय करना राज्यों के विधायी अधिकार क्षेत्र में आता है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अलग-अलग राज्यों में लोगों की आर्थिक स्थिति और भुगतान करने की क्षमता में अंतर है, इसलिए सभी राज्यों में एक समान कोर्ट फीस लागू करना उचित नहीं हो सकता। अदालत राज्य विधानसभाओं के विधायी अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
याचिका में सभी हाईकोर्ट और उनकी पीठों के लिए एक समान न्यायिक संहिता बनाने, मुकदमों के वर्गीकरण, पंजीकरण प्रक्रिया, संक्षिप्त नामों और न्यायिक शब्दावली को मानकीकृत करने की मांग की गई थी। इसके लिए विधि आयोग से रिपोर्ट तैयार कराने या विशेषज्ञ समिति गठित करने का विकल्प भी सुझाया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इन मांगों पर न्यायिक आदेश देने के बजाय याचिकाकर्ता को ई-कमेटी के समक्ष अपना पक्ष रखने की अनुमति दी।
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Wow
0
Sad
0
Angry
0
Comments (0)