क्या हैं ग्रीन पटाखे? दिवाली पर सुप्रीम कोर्ट ने दी सीमित मंजूरी, जानिए आम पटाखों से कितना अलग और क्या हैं नियम

Monday, November 2, 2026 - 18:28
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क्या हैं ग्रीन पटाखे? दिवाली पर सुप्रीम कोर्ट ने दी सीमित मंजूरी, जानिए आम पटाखों से कितना अलग और क्या हैं नियम

नई दिल्ली। दिवाली पर पटाखों से होने वाले वायु और ध्वनि प्रदूषण को कम करने के लिए ग्रीन पटाखों को विकल्प के तौर पर विकसित किया गया है। ये सामान्य पटाखों की तुलना में कम प्रदूषण फैलाने के उद्देश्य से तैयार किए जाते हैं। हालांकि, इन्हें पूरी तरह प्रदूषण-मुक्त या पर्यावरण के लिए पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा सकता। इस बार सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-NCR में दिवाली के अवसर पर सीमित अवधि के लिए प्रमाणित ग्रीन पटाखों के इस्तेमाल की सशर्त अनुमति दी है।

**क्या होते हैं ग्रीन पटाखे?**

ग्रीन पटाखे वे आतिशबाजी उत्पाद हैं, जिनकी रासायनिक संरचना और निर्माण में बदलाव करके उनसे निकलने वाले धुएं और हानिकारक कणों को कम किया जाता है। इन्हें वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) के तहत राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (NEERI) ने विकसित किया है। संस्थान के मानकों के अनुसार, इन पटाखों से निकलने वाले पार्टिकुलेट मैटर यानी PM के उत्सर्जन में सामान्य पटाखों की तुलना में कम-से-कम 30 प्रतिशत की कमी होनी चाहिए। कुछ निर्धारित श्रेणियों में कणों और गैसीय प्रदूषकों के उत्सर्जन में संयुक्त रूप से कमी का मानक भी लागू होता है।

**कैसे तैयार किए जाते हैं ग्रीन पटाखे?**

ग्रीन पटाखों को तैयार करने में पारंपरिक पटाखों की तुलना में कच्चे माल की मात्रा और संरचना में बदलाव किया जाता है। इनमें धूल और धुएं को कम करने वाले विशेष तत्वों तथा बेहतर दहन क्षमता वाली वैज्ञानिक रूप से विकसित संरचनाओं का इस्तेमाल किया जाता है। इनके निर्माण में प्रतिबंधित रसायनों, खासकर बेरियम लवण, का इस्तेमाल नहीं किया जाता। इनकी अलग-अलग श्रेणियों के उत्सर्जन और अन्य मानकों की जांच निर्धारित संस्थानों द्वारा की जाती है। इनके निर्माण की प्रक्रिया सामान्य पटाखों से अलग और नियामकीय निगरानी के अधीन होती है।

**आम और ग्रीन पटाखों में क्या है अंतर?**

पारंपरिक पटाखों में इस्तेमाल होने वाली सामग्री के जलने से अधिक मात्रा में धुआं, सूक्ष्म कण और सल्फर डाइऑक्साइड तथा नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसी गैसें निकल सकती हैं। इसके विपरीत, ग्रीन पटाखों की संरचना इस तरह विकसित की जाती है कि इन प्रदूषकों का उत्सर्जन कम हो। कुछ ग्रीन पटाखों में धूल को नियंत्रित करने और दहन की क्षमता बेहतर बनाने वाली तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि, ग्रीन पटाखे जलाने से भी प्रदूषण और शोर पैदा होता है। इसलिए इन्हें सामान्य पटाखों का पूरी तरह सुरक्षित विकल्प नहीं कहा जा सकता।

**सुप्रीम कोर्ट ने क्या दी है अनुमति?**

सुप्रीम कोर्ट ने 2 नवंबर 2026 को दिल्ली-NCR में दिवाली के लिए 7 और 8 नवंबर को प्रमाणित ग्रीन पटाखे जलाने की अनुमति दी है। अदालत के निर्देश के अनुसार, इनका इस्तेमाल सुबह 6 बजे से 7 बजे तक और रात 8 बजे से 10 बजे तक ही किया जा सकेगा। 9 नवंबर से पटाखों पर पहले से लागू पूर्ण प्रतिबंध फिर प्रभावी हो जाएगा।

अदालत ने अस्पतालों, नर्सिंग होम, प्राथमिक और जिला स्वास्थ्य केंद्रों, वृद्धाश्रमों तथा शैक्षणिक संस्थानों के 300 मीटर के दायरे में पटाखे जलाने पर रोक लगाई है। इन स्थानों को 'नो-क्रैकर जोन' के रूप में चिह्नित किया जाएगा। पटाखों की लड़ियां और श्रृंखलाबद्ध पटाखे बनाने तथा बेचने की भी अनुमति नहीं होगी।

**बिक्री और खरीद से जुड़े क्या हैं नियम?**

दिल्ली-NCR में केवल CSIR-NEERI से प्रमाणित ग्रीन पटाखों की बिक्री और इस्तेमाल की अनुमति है। इनके पैकेट पर उत्पाद से जुड़ा QR कोड होना जरूरी है, जिससे प्रमाणिकता की जांच की जा सके। बेरियम वाले और गैर-प्रमाणित पटाखों पर रोक रहेगी। बिक्री केवल प्रशासन की ओर से निर्धारित स्थानों पर अधिकृत विक्रेताओं के माध्यम से की जा सकेगी। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए बिक्री की अनुमति नहीं है। नियमों का उल्लंघन करने वाले निर्माताओं और विक्रेताओं के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।

**क्या पूरे देश में लागू हैं ये नियम?**

यह स्पष्ट करना जरूरी है कि 2 नवंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट की ओर से दी गई दो दिन की विशेष छूट दिल्ली-NCR के लिए है। इसे पूरे देश में पटाखे जलाने की सामान्य अनुमति नहीं माना जा सकता। अन्य राज्यों और शहरों में पटाखों की बिक्री तथा इस्तेमाल को लेकर स्थानीय प्रशासन, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और अदालतों के अलग-अलग निर्देश लागू हो सकते हैं। इसलिए ग्रीन पटाखों को लेकर नियम क्षेत्र के अनुसार अलग हो सकते हैं।

कुल मिलाकर, ग्रीन पटाखे प्रदूषण कम करने की दिशा में एक वैज्ञानिक विकल्प हैं, लेकिन इनसे भी पर्यावरण और स्वास्थ्य पर असर पड़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट की सीमित अनुमति का उद्देश्य त्योहार की परंपराओं और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच संतुलन बनाए रखना है।

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