नई दिल्ली: आंबेडकर की विरासत को बताया अमर, CJI सूर्यकांत बोले- संविधान को जीवंत रखना हर पीढ़ी की जिम्मेदारी

Saturday, November 7, 2026 - 16:12
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नई दिल्ली: आंबेडकर की विरासत को बताया अमर, CJI सूर्यकांत बोले- संविधान को जीवंत रखना हर पीढ़ी की जिम्मेदारी

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने शुक्रवार को नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि एक निरंतर जिम्मेदारी है। इसके मूल स्वरूप को तैयार किया जा चुका है, लेकिन इसके आदर्शों को वास्तविक जीवन में लागू करना हर पीढ़ी का दायित्व है। यह सम्मेलन एससी, एसटी एवं ओबीसी एडवोकेट्स एसोसिएशन की ओर से डॉ. भीमराव आंबेडकर के जीवन, संघर्ष और संवैधानिक विरासत पर आयोजित किया गया था।

अपने संबोधन में सीजेआई ने डॉ. बीआर आंबेडकर के योगदान को याद करते हुए कहा कि उन्होंने अपने महत्वपूर्ण संघर्षों को कानून के माध्यम से आगे बढ़ाया। उनके संघर्षों का सबसे स्थायी परिणाम भारतीय संविधान है। उन्होंने शिक्षा को स्वतंत्रता का पहला साधन बताते हुए कहा कि शिक्षा व्यक्ति को रोजगार, सार्वजनिक जीवन में अपनी आवाज उठाने और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होने का अवसर देती है।

क्या केवल कानून से आ सकती है समानता?

समानता के मुद्दे पर सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि केवल अदालतों और कानूनों के माध्यम से समाज में वास्तविक समानता स्थापित नहीं की जा सकती। इसके लिए नागरिकों के रोजमर्रा के व्यवहार और सामाजिक सोच में भी बदलाव जरूरी है। उन्होंने आंबेडकर के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि लोकतंत्र केवल शासन व्यवस्था नहीं, बल्कि ऐसा सामाजिक जीवन है, जिसमें लोग एक-दूसरे के साथ समानता और सम्मान का व्यवहार करते हैं। आंबेडकर ने बंधुत्व को लोकतंत्र का दूसरा नाम बताया था।

महाड़ सत्याग्रह से समझाया अधिकारों का महत्व

सीजेआई ने 1927 के महाड़ सत्याग्रह का उल्लेख करते हुए बताया कि सार्वजनिक जलस्रोतों पर दलित समुदाय के अधिकार को लेकर डॉ. आंबेडकर ने संघर्ष किया था। वर्ष 1923 में बॉम्बे विधान परिषद ने सार्वजनिक जलस्रोतों को सभी वर्गों के लिए खोलने का प्रस्ताव पारित किया था, लेकिन सामाजिक विरोध के कारण दलित समुदाय को इसके बावजूद पानी लेने का अधिकार व्यवहार में नहीं मिल पाया। इसके बाद आंबेडकर अपने समर्थकों के साथ महाड़ के चवदार तालाब पहुंचे और वहां पानी पिया।

उन्होंने इस संघर्ष से मिले तीन महत्वपूर्ण सबक बताए। पहला, प्रस्ताव से मिला अधिकार आसानी से वापस लिया जा सकता है। दूसरा, किसी अधिकार की मजबूती उसके कानूनी संरक्षण और न्याय पाने के उपायों पर निर्भर करती है। तीसरा, न्यायसंगत मांग को भी अदालत में स्वीकार होने में लंबा समय लग सकता है।

सीजेआई ने संविधान के अनुच्छेद 32 का उल्लेख करते हुए कहा कि मौलिक अधिकारों के संरक्षण के लिए सीधे सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि अधिकार तभी सार्थक हैं, जब आम नागरिक उन तक पहुंच सके और उनका लाभ उठा सके। उन्होंने युवा वकीलों से आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को कानूनी सहायता देने के लिए समय निकालने की अपील भी की।

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