काली पूजा 2026 कल: 8 नवंबर को मनाया जाएगा मां काली का महापर्व, जानें निशिता काल मुहूर्त, पूजा विधि, सामग्री और मंत्र

Saturday, November 7, 2026 - 22:56
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काली पूजा 2026 कल: 8 नवंबर को मनाया जाएगा मां काली का महापर्व, जानें निशिता काल मुहूर्त, पूजा विधि, सामग्री और मंत्र

काली पूजा 2026 का पर्व रविवार, 8 नवंबर को कार्तिक अमावस्या के अवसर पर मनाया जाएगा। इसे श्यामा पूजा और दीपान्विता काली पूजा के नाम से भी जाना जाता है। खासतौर पर पश्चिम बंगाल, असम, ओडिशा और त्रिपुरा में इस पर्व का विशेष महत्व है। इस दिन श्रद्धालु मां काली की आराधना कर सुख-शांति, साहस, सुरक्षा और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति की कामना करते हैं। वर्ष 2026 में काली पूजा और दीपावली एक ही दिन पड़ रही हैं। जहां देश के अधिकांश हिस्सों में इस अवसर पर मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा होती है, वहीं बंगाल सहित पूर्वी भारत के कई क्षेत्रों में मध्यरात्रि के समय मां काली की विशेष आराधना की जाती है।

कार्तिक अमावस्या तिथि और पूजा का शुभ मुहूर्त

पंचांग के अनुसार, कार्तिक अमावस्या तिथि 8 नवंबर 2026 को सुबह 11 बजकर 27 मिनट से शुरू होकर 9 नवंबर को दोपहर 12 बजकर 31 मिनट तक रहेगी। मां काली की पूजा के लिए निशिता काल को विशेष महत्व दिया जाता है, जो मध्यरात्रि का समय होता है।

दिल्ली के लिए निशिता काल पूजा मुहूर्त रात 11 बजकर 39 मिनट से 9 नवंबर की रात 12 बजकर 31 मिनट तक रहेगा। कोलकाता में यह समय रात 10 बजकर 55 मिनट से 11 बजकर 46 मिनट तक रहेगा। मथुरा में निशिता पूजा का समय लगभग रात 11 बजकर 37 मिनट से 9 नवंबर की सुबह 12 बजकर 29 मिनट तक रहेगा। अलग-अलग शहरों में सूर्योदय और सूर्यास्त के अंतर के कारण मुहूर्त में कुछ मिनटों का अंतर हो सकता है। इसलिए श्रद्धालुओं को अपने स्थानीय पंचांग के अनुसार पूजा का समय देखना चाहिए।

काली पूजा का धार्मिक महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां काली को आदिशक्ति का उग्र और शक्तिशाली स्वरूप माना जाता है। उनका स्वरूप बुराई, अज्ञान और नकारात्मक शक्तियों के विनाश का प्रतीक है। मान्यता है कि मां काली अपने भक्तों की रक्षा करती हैं और उन्हें भय, संकट तथा कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति प्रदान करती हैं। काली पूजा के अवसर पर श्रद्धालु विशेष रूप से मां से साहस, आत्मबल और परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करते हैं।

काली पूजा की सामान्य विधि

काली पूजा के दिन घर और पूजा स्थल की साफ-सफाई कर मां काली की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित की जाती है। इसके बाद पूजा स्थल पर दीपक और धूप जलाकर भगवान गणेश का स्मरण किया जाता है। फिर मां काली का ध्यान करते हुए संकल्प लिया जाता है। श्रद्धालु मां को लाल गुड़हल के फूल, फल, मिठाई, नारियल और पारंपरिक भोग अर्पित करते हैं। इसके बाद मां काली के मंत्रों का जाप, आरती और प्रार्थना की जाती है।

परंपरागत रूप से काली पूजा का मुख्य अनुष्ठान निशिता काल में किया जाता है। मंदिरों और सार्वजनिक पूजा पंडालों में पुरोहितों द्वारा स्थानीय परंपरा और विधि के अनुसार विशेष पूजा-अर्चना संपन्न कराई जाती है। घरों में सामान्य श्रद्धापूर्वक पूजा करने वाले परिवार अपनी परंपरा के अनुसार दीपक जलाकर मां का स्मरण और आरती कर सकते हैं।

पूजा में इस्तेमाल होने वाली सामग्री

काली पूजा के लिए मां काली की प्रतिमा या तस्वीर, लाल गुड़हल के फूल, पुष्पमाला, फल, मिठाई, नारियल, धूप, दीपक, घी या तेल, रुई की बत्ती, अगरबत्ती, रोली, अक्षत, सिंदूर, जल और पूजा की थाली रखी जाती है। भोग में परिवार की परंपरा के अनुसार फल और मिठाइयां अर्पित की जाती हैं। सामग्री का चयन स्थानीय रीति-रिवाज और पुरोहित के मार्गदर्शन के अनुसार किया जा सकता है।

मां काली के प्रमुख मंत्र

मां काली की आराधना के लिए श्रद्धालु सरल मंत्रों का जाप करते हैं। इनमें प्रमुख हैं:

ॐ क्रीं कालिकायै नमः।

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।

जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी।

दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते॥

इन मंत्रों का जाप श्रद्धा और एकाग्रता के साथ किया जाता है। विशेष तांत्रिक मंत्रों और विस्तृत अनुष्ठानों के लिए योग्य पुरोहित का मार्गदर्शन लेना उचित माना जाता है।

काली पूजा और दीपावली का संबंध

काली पूजा और दीपावली दोनों कार्तिक अमावस्या से जुड़ी हुई हैं। देश के कई हिस्सों में दीपावली की शाम मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की जाती है, जबकि पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर भारत के कई क्षेत्रों में इसी अमावस्या की रात मां काली की आराधना होती है। कोलकाता में कालीघाट और दक्षिणेश्वर जैसे प्रसिद्ध मंदिरों में इस अवसर पर विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं। जगह-जगह पूजा पंडाल सजाए जाते हैं और श्रद्धालु देर रात तक मां के दर्शन तथा आरती में शामिल होते हैं।

काली पूजा का संदेश बुराई पर अच्छाई की विजय, अज्ञान पर ज्ञान और भय पर साहस की जीत से जुड़ा है। यह पर्व श्रद्धालुओं को आत्मबल, सकारात्मकता और शक्ति की आराधना का संदेश देता है।

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