लूला की जीत और युवा आंदोलनों का उभार: कल्याणकारी राज्य और पूंजीवाद के संकट पर बहस

Thursday, October 29, 2026 - 19:14
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लूला की जीत और युवा आंदोलनों का उभार: कल्याणकारी राज्य और पूंजीवाद के संकट पर बहस

ब्राजील में वर्कर्स पार्टी के नेता लुइज़ इनासियो लूला द सिल्वा ने 25 अक्टूबर 2026 को हुए राष्ट्रपति चुनाव के दूसरे चरण में जीत दर्ज कर चौथी बार राष्ट्रपति बनने का रास्ता साफ किया। उन्हें 51.79 प्रतिशत वैध वोट मिले, जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी फ्लावियो बोल्सोनारो को 48.21 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए। यह मुकाबला ब्राजील में गहरे राजनीतिक ध्रुवीकरण को भी दर्शाता है। 

लूला की जीत ऐसे समय में हुई है, जब दुनिया के कई हिस्सों में युवा रोजगार, शिक्षा, आवास और जीवनयापन की बढ़ती लागत जैसे मुद्दों को लेकर अपनी आवाज उठा रहे हैं। सर्बिया में छात्र आंदोलन से जुड़े उम्मीदवारों की चुनावी सफलता ने भी यह दिखाया है कि युवाओं की लामबंदी राजनीतिक बदलाव में भूमिका निभा सकती है। भारत में भी बेरोजगारी और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर युवा तथा विपक्षी समूह सक्रिय हैं। हालांकि, अलग-अलग देशों के आंदोलनों की परिस्थितियां और मांगें एक जैसी नहीं हैं।

इन घटनाओं को समझने का एक नजरिया यह है कि आर्थिक असमानता, सार्वजनिक सेवाओं पर दबाव और अवसरों की कमी ने लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के प्रति लोगों की अपेक्षाओं को बढ़ाया है। आलोचकों का तर्क है कि जब सरकारों की नीतियों पर बड़े कारोबारी समूहों का प्रभाव बढ़ता है, तो आम नागरिकों की जरूरतें पीछे छूट सकती हैं। इसी संदर्भ में ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ यानी सत्ता और कारोबार के बीच ऐसे गठजोड़ की चर्चा होती है, जिसमें कुछ प्रभावशाली समूहों को अनुचित लाभ मिलने की आशंका रहती है।

ब्राजील में लूला की राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा सामाजिक कल्याण की योजनाएं रही हैं। उनके पहले दो कार्यकालों और मौजूदा कार्यकाल में गरीब परिवारों की आर्थिक सहायता, शिक्षा, स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा पर जोर दिया गया। बोल्सा फामिलिया योजना के तहत पात्र परिवारों को नकद सहायता दी जाती है और बच्चों की शिक्षा तथा टीकाकरण जैसी शर्तें भी जुड़ी होती हैं। इन कार्यक्रमों को ब्राजील में गरीबी घटाने के प्रयासों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। हालांकि, गरीबी और असमानता में बदलाव का आकलन करते समय रोजगार, आर्थिक वृद्धि, महंगाई और अन्य सरकारी नीतियों के प्रभाव को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

लूला की राजनीतिक यात्रा मजदूर आंदोलन से राष्ट्रपति पद तक पहुंचने की कहानी है। 2003 से 2010 तक राष्ट्रपति रहने के बाद वह 2022 में तीसरी बार सत्ता में लौटे। उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी और पूर्व राष्ट्रपति जेयर बोल्सोनारो के समर्थकों के साथ ब्राजील में लंबे समय से वैचारिक संघर्ष जारी है। लूला की आर्थिक नीतियों में बाजार व्यवस्था के साथ सामाजिक सहायता और सार्वजनिक सेवाओं पर खर्च को महत्व दिया गया है। इसे पूरी तरह समाजवादी व्यवस्था के बजाय सामाजिक लोकतंत्र से जुड़ी नीतियों के रूप में भी समझा जाता है।

लूला की विदेश नीति भी चर्चा का विषय रही है। ब्राजील ने अमेरिका के साथ संबंध बनाए रखते हुए चीन सहित अन्य देशों के साथ आर्थिक और कूटनीतिक सहयोग बढ़ाया है। इस नीति को समर्थक स्वतंत्र विदेश नीति के रूप में देखते हैं, जबकि आलोचक इसके आर्थिक और रणनीतिक प्रभावों पर सवाल उठाते हैं। ब्राजील की राजनीति में घरेलू आर्थिक मुद्दों के साथ विदेश नीति और राष्ट्रीय संप्रभुता की बहस भी महत्वपूर्ण बनी हुई है।

यूरोप के विभिन्न देशों में शिक्षा व्यवस्था, आवास की उपलब्धता, कम वेतन और महंगाई को लेकर विरोध प्रदर्शन होते रहे हैं। इन मुद्दों का साझा पहलू यह है कि युवा बेहतर भविष्य, सुलभ शिक्षा और रहने के लिए किफायती घर चाहते हैं। जब इन जरूरतों को पूरा करना कठिन होता है, तो सरकारों की आर्थिक और सामाजिक नीतियों पर सवाल उठते हैं। फिर भी प्रत्येक देश में आंदोलनों की पृष्ठभूमि, राजनीतिक दिशा और मांगें अलग-अलग हैं।

भारत में भी शिक्षा, रोजगार, महंगाई और लोकतांत्रिक संस्थाओं की जवाबदेही को लेकर बहस जारी है। विपक्षी दल चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची से जुड़े मुद्दे उठाते रहे हैं, जबकि सरकार और संबंधित संस्थाओं के पक्ष को भी तथ्यों तथा आधिकारिक जवाबों के आधार पर परखना जरूरी है। सोशल मीडिया ने युवाओं को अपने विचार साझा करने और अभियान चलाने का मंच दिया है, लेकिन किसी ऑनलाइन आंदोलन की लोकप्रियता को व्यापक जनमत का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता।

लूला की जीत के बाद कल्याणकारी योजनाओं, आर्थिक असमानता और लोकतांत्रिक जवाबदेही पर चर्चा को नया संदर्भ मिला है। ब्राजील, यूरोप और भारत के अनुभवों से यह सवाल सामने आता है कि आर्थिक विकास का लाभ समाज के अलग-अलग वर्गों तक किस तरह पहुंचता है और सरकारें शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार तथा आवास जैसी बुनियादी जरूरतों को किस हद तक पूरा कर पाती हैं। इन सवालों के जवाब किसी एक चुनाव या नेता की जीत से तय नहीं होते, बल्कि नीतियों के परिणाम, संस्थाओं की मजबूती और नागरिकों की भागीदारी से सामने आते हैं।

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