थापा नहीं, एक दौर खत्म: वरिष्ठ फोटो जर्नलिस्ट आर.बी. थापा के मामले ने उठाए सवाल
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में वरिष्ठ फोटो जर्नलिस्ट आर.बी. थापा को उनके लंबे समय से रह रहे आवास से बेदखल किए जाने का मामला चर्चा में है। इस घटना को लेकर पत्रकारिता जगत में नाराजगी जताई जा रही है। थापा के समर्थन में उठ रही आवाजों के बीच पुलिस-प्रशासन की कार्रवाई, न्यायालय के आदेश के पालन और पत्रकारों के लिए आवास की व्यवस्था को लेकर कई सवाल उठाए गए हैं। उनके समर्थकों का कहना है कि पत्रकारों के हितों की रक्षा के लिए आवाज उठाने वाले संस्थानों और संगठनों को इस मामले में आगे आना चाहिए तथा आर.बी. थापा को न्याय दिलाने के लिए प्रयास करने चाहिए।
उठाए गए आरोपों के अनुसार, एलडीए में कार्यरत एक बाबू और उनके बेटे पर थापा के परिवार के लगभग 55 वर्षों पुराने निवास को कथित तौर पर बेहद कम कीमत पर खरीदने और परिवार को बेघर करने का आरोप लगाया गया है। आरोप लगाने वालों ने संबंधित कर्मचारियों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप भी लगाए हैं। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित पक्षों का जवाब सामने आना बाकी है। इस मामले में पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई पर भी सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि कार्रवाई के दौरान न्यायाधीश के आदेश का प्रभावी पालन नहीं हुआ और पुलिसकर्मियों तथा कुछ अधिवक्ताओं ने परिवार की महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया। इस घटना को ईमानदार पत्रकारिता और पत्रकारों की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मामला बताया जा रहा है।

आर.बी. थापा के संघर्ष को याद करते हुए उनके साथ लंबे समय तक काम कर चुके एक पत्रकार ने लिखा कि झुक गया कंधा, लेकिन ईमान नहीं झुका। उन्होंने डिजिटल युग से पहले के फोटो जर्नलिस्टों के संघर्ष का उल्लेख करते हुए बताया कि उस दौर में कैमरे और उनसे जुड़े उपकरणों का भारी बैग एक कंधे पर लटकाकर चलना पड़ता था। उपकरणों का वजन इतना अधिक होता था कि छायाकारों का शरीर प्रभावित हो जाता था और उनका एक कंधा झुक जाता था। लेखक के अनुसार, करीब तीस वर्षों के संबंध में उन्होंने थापा को शायद ही कभी कैमरे के बैग के बिना देखा हो। बीस-बाइस वर्ष पहले उनका कैमरा बैग बेहद भारी और जर्जर था, जबकि उनकी स्कूटर की हालत भी काफी खराब रहती थी। इसके बावजूद आर्थिक अभाव के बीच भी थापा ने अपने ईमान से समझौता नहीं किया।
लेख में कहा गया कि यदि थापा ने भी ईमानदारी का रास्ता छोड़कर बेईमानी का सहारा लिया होता, तो शायद आज उन्हें बेघर होने की स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता। लेखक ने याद किया कि पानी की बौछारों, आग की लपटों, लाठीचार्ज और फायरिंग जैसी परिस्थितियों के बीच तस्वीरें लेने में आर.बी. थापा हमेशा आगे रहे। अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस से जुड़ी उनकी पहली तस्वीर को भी विश्व स्तर पर चर्चित बताया गया है। उनके लंबे पत्रकारिता जीवन और जोखिम उठाकर काम करने के अनुभव को याद करते हुए सवाल किया गया कि मेहनत, शोहरत और ईमानदारी के बावजूद उनकी जिंदगी आज इस मोड़ पर क्यों पहुंच गई। लेख में प्रतीकात्मक रूप से कहा गया कि जीवन का भार केवल ईमानदारी और गरीबी के सहारे उठाना कठिन हो जाता है, जबकि बेईमानी का एक सहारा होता तो शायद उन्हें आज ऐसी स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता।

थापा को बेघर किए जाने की तस्वीरों को विचलित करने वाला बताते हुए लेखक ने कहा कि पुराने मीडियाकर्मियों के साथ उनका रिश्ता केवल पेशेवर नहीं, बल्कि वर्षों की मेहनत और संघर्ष से बना हुआ है। पहले अखबारों की संख्या कम थी और संसाधन भी सीमित थे, इसलिए पत्रकारों और छायाकारों को अधिक मेहनत करनी पड़ती थी। जिन लोगों ने थापा के साथ काम किया, उनके बीच पसीने से बना एक गहरा संबंध है। लेख में इस रिश्ते की तुलना खून और नमक के रिश्ते से करते हुए कहा गया कि साथ काम करने के दौरान बने ऐसे संबंध आसानी से समाप्त नहीं होते।
लेखक ने यह सवाल भी उठाया कि सोशल मीडिया पर समर्थन जताने के अलावा जमीन पर उतरकर अपने साथी की मदद कैसे की जा सकती है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि आर.बी. थापा से संपर्क और उनकी सहमति के बिना किसी भी सहायता अभियान या अन्य पहल को आगे बढ़ाना उचित नहीं होगा। उनके अनुसार, सवाल केवल यह नहीं है कि लखनऊ जिला प्रशासन या पुलिस ने उन्हें घर से बाहर किया, बल्कि यह भी है कि तमाम जायज प्रयासों के बावजूद राज्य संपत्ति विभाग ने उन्हें आवास क्यों नहीं दिया।

लेख में दावा किया गया कि राज्य संपत्ति विभाग के अंतर्गत पत्रकारों को आवास आवंटित करने के लिए निर्धारित मानकों और नियमों के अनुसार आर.बी. थापा को आवास मिलना चाहिए था। पहला नियम यह बताया गया कि आवेदक के नाम पर कोई मकान नहीं होना चाहिए। लेख के मुताबिक, इलाहाबाद हाईकोर्ट और उत्तर प्रदेश सरकार के जिला प्रशासन की ओर से यह दलील दी गई है कि फोटो जर्नलिस्ट आर.बी. थापा के नाम पर कोई आवास नहीं है। दूसरा नियम आवेदक के अनुभव से संबंधित बताया गया है। लेख में कहा गया कि थापा चार दशकों से अधिक समय से लखनऊ में श्रमजीवी फोटो जर्नलिस्ट के रूप में लगातार काम करते रहे हैं। उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया, नवभारत टाइम्स, दैनिक जागरण, कुबेर टाइम्स और स्वतंत्र भारत सहित प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में चार दशक से अधिक समय तक काम किया है।
इस पूरे मामले ने पत्रकारों के सम्मान, उनकी सामाजिक सुरक्षा, आवास की उपलब्धता और प्रशासनिक कार्रवाई के दौरान कानूनी प्रक्रिया के पालन जैसे मुद्दों को फिर चर्चा में ला दिया है। आर.बी. थापा के समर्थन में उठ रही आवाजों के बीच मांग की जा रही है कि मामले से जुड़े आरोपों की निष्पक्ष जांच हो, परिवार के साथ कथित दुर्व्यवहार के आरोपों पर कार्रवाई की जाए और पत्रकारों के लिए निर्धारित आवासीय नियमों के तहत उनके मामले पर गंभीरता से विचार किया जाए। साथ ही, पत्रकार संगठनों और साथियों से अपील की गई है कि वे थापा के साथ खड़े होकर उनकी सहमति से उचित सहायता और न्याय की दिशा में ठोस पहल करें।
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